- त्रिवेणी पाठक

एक बार और तेरे नाम पे वारा जाऊँ – त्रिवेणी पाठक

एक बार और तेरे नाम पे वारा जाऊँ
सोचता हूँ कि तेरी सिम्त दुबारा जाऊँ

तू मेरी रूह में शामिल हो हवा की मानिंद
मै तेरे जिस्म की मिट्टी में उतारा जाऊँ

उम्र भर हिज्र की घाटी में रहा बेआवाज़
लाख चाहा कि पुकारूँ या पुकारा जाऊँ

इश्क ग़र खेल ही ठहरा तो चलो खेल सही
तू अगर जीत रहा हो तो मै हारा जाऊँ

अब कोई और जुगत हो तो बता कूजागर
आँच में तप के ये जाना कि सुधारा जाऊँ

क्या तुझे ठीक लगेगा मेरे शीरीं दरवेश !
जैसा आया था यहाँ वैसा ही खारा जाऊँ ?

लोग कहते हैं तेरी दीद में जादू है कोई
काश, इक दिन तेरी नजरों से गुज़ारा जाऊँ

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