शिज्जु शकूर

किसी ने सल्तनत से जब बगावत की

किसी ने सल्तनत से जब बगावत की
हवाएँ चल उठीं पुरज़ोर नफ़रत की

समर पेड़ों पे आते आते आएँगे
तभी तुम देखना तासीर कुदरत की

मुझे चलना पड़ेगा दुनिया से बचकर
कि अब मिलने लगी है दाद हिम्मत की

यहाँ तो कुछ ज़हीनों की ज़बाँ पर भी
जमी है कितनी ही पर्तें कुदूरत की

मनाए ख़ैर कोई जान की कब तक
यहाँ तलवार चलती हैं जहालत की

Shijju Shakoor

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4 Comments

  1. रोहिताश्व मिश्रा says:

    वाआआह}

  2. हेमन्त says:

    बहुत ही उम्दा ग़ज़ल कही है आदरणीय शकूर सर क्या कहने ढेर सारी बधाईयाँ स्वीकार करें….

  3. Sanjay Agnihotri says:

    बहुत खूब !
    लबों पे जमी परत नफरत की आँधी जहानत की तलवार
    क्या बात है !!!

  4. Wahh bahut khoob

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