खुर्शीद ख़ैराड़ी

किस-किस बात का रोना रोया जाए – खुर्शीद खैराड़ी

किस-किस बात का रोना रोया जाए
दरिया में हर ग़म को डुबोया जाए

छाँट लिए जाएँ काँटे आँचल के
फूलों का इक हार पिरोया जाए

अपने जैसा तो न ज़माना होगा
यार ज़माने जैसा होया जाए

हमने जो अहसान किए लोगों पर
इस गठरी को कब तक ढोया जाए

सूख गई है रिश्तों की हरियाली
बंज़र धरती में क्या बोया जाए

यूँ तो नहीं लगना जी इस दुनिया में
फिर से कोई ख़ाब सँजोया जाए

शम्अ-ए-ग़ज़ल ‘खुरशीद’ बुझाओ अब तो
आधी रात है थोड़ा सोया जाए

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *