के पी अनमोल

खून ए दिल से लफ़्ज़ मुअत्तर करता है – के पी अनमोल

खून ए दिल से लफ़्ज़ मुअत्तर करता है
क्या-क्या जादू एक सुखनवर करता है

रात-रात भर खुद ही खुद में जग-जगकर
दुनिया भर की सोच मुनव्वर करता है

मेरा बेड़ा मँझधारों में उलझा के
एक छलावा रोज़ समंदर करता है

पेशानी पर बोसा तेरी चाहत का
दिल पर कितने जंतर-मंतर करता है

गैरों को मुस्कान बाँटने वाला ही
मातम अक्सर अंदर-अंदर करता है

अपनी कमियाँ ढूँढा करता है अनमोल
ऐसे ख़ुद को खु़द से बेहतर करता है

मुअत्तर – खुश्बूदार, सुखनवर – साहित्यकार, मुनव्वर – रौशन
पेशानी – ललाट, बोसा – चुम्बन,

के पी अनमोल

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1 Comment

  1. लाल चन्द जैदिया "जैदि" says:

    क्या खूब कहा है सर ।
    गजब अंदाज।

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