के पी अनमोल

गाँव को भी शहरी जीवन दे गया – के पी ‘अनमोल’

आप सभी के हुज़ूर पेश है रूड़की के सशक्त ग़ज़लकार मोहतरम के. पी. अनमोल साहब की एक बेहतरीन ग़ज़ल,

गाँव को भी शहरी जीवन दे गया
कौन इतना अजनबीपन दे गया

एक गज टुकड़ा ज़मीं का देखिए
भाई को भाई से अनबन दे गया

याद मैंने क्या दिलाया उसको फ़र्ज़
हाथ में मुझको वो दरपन दे गया

प्यास ने की थी गुज़ारिश मेघ से
फिर मगर वो आश्वासन दे गया

क्या कमी थी मुझको पहले से बता
तू नयी फिर एक उलझन दे गया

ख़ासियत ऐसी थी क्या अनमोल में
किस अदा पर तू इसे मन दे गया

अनमोल साहिब वेब मैगज़ीन हस्ताक्षर के प्रधान संपादक हैं तथा ग़ज़ल के अच्छे जानकारों में से एक हैं।

You may also like...

11 Comments

  1. goghazald says:

    अनमोल साहब की ये ग़ज़ल मेरी पसंदीदा ग़ज़लों में से एक है। उन्होंने बेहद सादगी से आधुनिकता के साथ अपनी पहचान खोते जीवन को मतले में उभारा है। जदीद खयालात आपकी खासियत है।
    //एक गज टुकड़ा ज़मीं का देखिए
    भाई को भाई से अनबन दे गया// इस सत्य से कोई इनकार नहीं कर सकता है। अनमोल साहिब की इस ग़ज़ल पर अपनी प्रतिक्रया ज़रूर दें।

  2. के. पी. अनमोल says:

    ज़र्रा नवाज़ी के लिए आपका बहुत शुक्रगुज़ार हूँ मोहतरम शिज्जु शकूर साहब

  3. कविता विकास says:

    बहुत बहुत बधाई ।वाकई बेहतरीन ग़ज़ल है ।एक -एक शेर में सच्चाई को खूबसूरती से उकेरा गया है । छपने वाले और छापने वाले दोनों बधाई के पात्र हैं ।

    1. के. पी. अनमोल says:

      बहुत शुक्रिया आदरणीया कविता विकास जी

  4. डॉ. राकेश जोशी says:

    सरल शब्दों में अपनी बात कहने का हुनर अनमोल जी के पास है जो उन्हें ग़ज़लों की दुनिया में दूर तक ले जाएगा। बधाई एवं शुभकामनाएं!

    1. के. पी. अनमोल says:

      बहुत शुक्रिया सर। आपका आशीष और सहयोग बना रहा तो शायद ऐसा हो पाये। आप सभी सीखता जा रहा हूँ।

  5. suren bishnoe says:

    बेहद खूबसूरत पंक्तियां सर

  6. Ishan Ahmad says:

    मोहतरम जनाब K P Anmol साहब मेरे बड़े भाई व गुरुतुल्य हैं ।कवाफ़ी समय से रोकी ग़ज़लें पढ़ता सुनता रहा हूँ।आप एक बेहतरीन शायर हैं।उपरोक्त ग़ज़ल अनमोल साहब की बेहतरीन ग़ज़लों में से एक है।सामाजिक सरोकारों और आपसी संबंधों व गांव व शहरी जीवन को जिस सच्चाई से अपने इस ग़ज़ल में उकेरा है वह आज के दौर में कम ही देखने को मिलता है।शिज्जू शकूर साहब का आभार के उन्होंने एक बड़े स्तर पर पाठकों को इस बेहतरीन ग़ज़ल से रूबरू कराया।बधाई अनमोल साहब।

  7. Ishan Ahmad says:

    मोहतरम जनाब K P Anmol साहब मेरे बड़े भाई व गुरुतुल्य हैं ।कवाफ़ी समय से रोकी ग़ज़लें पढ़ता सुनता रहा हूँ।आप एक बेहतरीन शायर हैं।उपरोक्त ग़ज़ल अनमोल साहब की बेहतरीन ग़ज़लों में से एक है।सामाजिक सरोकारों और आपसी संबंधों व गांव व शहरीतकतीअ और बहर [ग़ज़ल : शिल्प और संरचना] – सतपाल ‘ख्याल’

    बहर की यदि बात करें तो फ़ारसी के ये भारी भरकम शब्द जैसे फ़ाइलातुन, मसतफ़ाइलुन या तमाम बहरों के नाम आप को याद करने की ज़रूरत नही है। ये सब उबाऊ है इसे दिलचस्प बनाने की कोशिश करनी है। आप समझें कि संगीतकार जैसे गीतकार को एक धुन दे देता है कि इस पर गीत लिखो.. गीतकार उस धुन को बार-बार गुनगुनाता है और अपने शब्द उस मीटर / धुन / ताल में फिट कर देता है बस.. गीतकार को संगीत सीखने की ज़रूरत नहीं है उसे तो बस धुन को पकड़ना है। ये तमाम बहरें जिनका हमने ज़िक्र किया ये आप समझें एक किस्म की धुनें हैं। आपने देखा होगा छोटा सा बच्चा टी.वी पर गीत सुनके गुनगुनाना शुरू कर देता है वैसे ही आप भी इन बहरों की लय या ताल कॊ पकड़ें और शुरू हो जाइये। हाँ बस आपको शब्दों का वज़्न करना ज़रूर सीखना है जो आप उदाहरणों से समझ जाएंगे।

    हम शब्द को उस आधार पर तोड़ेंगे जिस आधार पर हम उसका उच्चारण करते हैं। शब्द की सबसे छोटी इकाई होती है वर्ण। तो शब्दों को हम वर्णों मे तोड़ेंगे। वर्ण वह ध्वनि हैं जो किसी शब्द को बोलने में एक समय में हमारे मुँह से निकलती है और ध्वनियाँ केवल दो ही तरह की होती हैं या तो लघु (छोटी) या दीर्घ (बड़ी)। अब हम कुछ शब्दों को तोड़कर देखते हैं और समझते हैं, जैसे:

    “आकाश”
    ये तीन वर्णो से मिलकर बना है.

    आ+ का+ श

    अब छोटी और बड़ी आवाज़ों के आधार पर या आप कहें कि गुरु और लघु के आधार पर हम इन्हें चिह्नित कर लेंगे. गुरु के लिए “2 ” और लघु के लिए ” 1″ का इस्तेमाल करेंगे.

    जैसे:
    सि+ता+रों के आ+गे ज+हाँ औ+र भी हैं.

    (1+2+2 1+ 2+2 1+2+2 1+ 2+2)

    अब हम इस एक-दो के समूहों को अगर ऐसे लिखें.
    122 122 122 122

    तो अब आगे चलते हैं बहरो की तरफ़. उससे पहले कुछ परिभाषाएँ देख लें जो आगे इस्तेमाल होंगी।

    तकतीअ:

    वो विधि जिस के द्वारा हम किसी मिसरे या शे’र को अरकानों के तराज़ू मे तौलते हैं, ये विधि तकतीअ कहलाती है। तकतीअ से पता चलता है कि शे’र किस बहर में है या ये बहर से खारिज़ है। सबसे पहले हम बहर का नाम लिख देते हैं।, फिर वो सालिम है या मुज़ाहिफ़ है. मसम्मन ( आठ अरकान ) की है इत्यादि.

    अरकान और ज़िहाफ़:

    अरकानों के बारे में तो हम जान गए हैं कि आठ अरकान जो बनाये गए जो आगे चलकर बहरों का आधार बने. ये इन आठ अरकानों में कोशिश की गई की तमाम आवाज़ों के संभावित नमूनों को लिया जाए.ज़िहाफ़ इन अरकानों के ही टूटे हुए रूप को कहते हैं जैसे:फ़ाइलातुन(२१२२) से फ़ाइलुन(२१२).

    मसम्मन और मुसद्द्स:

    लंबाई के लिहाज़ से बहरें दो तरह की होती हैं मसम्मन और मुसद्द्स. जिस बहर के एक मिसरे में चार और शे’र में आठ अरकान हों उसे मसम्मन बहर कहा जाता है और जिनमें एक मिसरे मे तीन शे’र में छ: उन बहरों को मुसद्द्स कहा जाता है. जैसे:

    सितारों के आगे जहाँ और भी हैं
    (122 122 122 122)
    अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं.
    (122 122 122 122)

    यह आठ अरकान वाली बहर है तो यह मसम्मन बहर है.

    मफ़रिद या मफ़रद और मुरक्कब बहरें:

    जिस बहर में एक ही रुक्न इस्तेमाल होता है वो मफ़रद और जिनमे दो या अधिक अरकान इस्तेमाल होते हैं वो मुरक्कब कहलातीं हैं जैसे:

    सितारों के अगे यहाँ और भी हैं
    (122 122 122 122)

    ये मफ़रद बहर है क्योंकि सिर्फ फ़ऊलुन ४ बार इस्तेमाल हुआ है.

    अगर दो अरकान रिपीट हों तो उस बहर को बहरे-शिकस्ता कहते हैं जैसे:
    फ़ाइलातुन फ़ऊलुन फ़ाइलातुन फ़ऊलुन

    अब अगर मैं बहर को परिभाषित करूँ तो आप कह सकते हैं कि बहर एक मीटर है, एक लय है, एक ताल है जो अरकानों या उनके ज़िहाफ़ों के साथ एक निश्चित तरक़ीब से बनती है. असंख्य बहरें बन सकती है एक समूह से.

    जैसे एक समूह है:

    122 122 122 122

    इसके कई रूप हो सकते हैं जैसे:

    122 122 122 12
    122 122 122 1
    122 122
    122 122 1

    सबसे पहली बहार है:

    बहरे-मुतका़रिब:

    1.मुत़कारिब (122×4) मसम्मन सालिम
    (चार फ़ऊलुन )

    *सितारों के आगे जहाँ और भी हैं
    अभी इश्क़ के इम्तिहां और भी हैं.

    *कोई पास आया सवेरे-सवेरे
    मुझे आज़माया सवेरे-सवेरे.

    रचनाकार परिचय:-

    सतपाल ख्याल ग़ज़ल विधा को समर्पित हैं। आप निरंतर पत्र-पत्रिकाओं मे प्रकाशित होते रहते हैं। आप सहित्य शिल्पी पर ग़ज़ल शिल्प और संरचना स्तंभ से भी जुडे हुए हैं तथा ग़ज़ल पर केन्द्रित एक ब्लाग आज की गज़ल का संचालन भी कर रहे हैं। आपका एक ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन है। अंतर्जाल पर भी आप सक्रिय हैं।

    ये दोनों शे’र बहरे-मुतकारिब में हैं और ये बहुत मक़बूल बहर है. बहर का सालिम शक्ल में इस्तेमाल हुआ है यानि जिस शक्ल में बहर के अरकान थे उसी शक्ल मे इस्तेमाल हुए.ये मसम्मन बहर है इसमे आठ अरकान हैं एक शे’र में.तो हम इसे लिखेंगे: बहरे-मुतका़रिब मफ़रद मसम्मन सालिम.अगर बहर के अरकान सालिम या शु्द्ध जीवन को जिस सच्चाई से अपने इस ग़ज़ल में उकेरा है वह आज के दौर में कम ही देखने को मिलता है।शिज्जू शकूर साहब का आभार के उन्होंने एक बड़े स्तर पर पाठकों को इस बेहतरीन ग़ज़ल से रूबरू कराया।बधाई अनमोल साहब।

    1. goghazald says:

      अच्छी जानकारी साझा की है ईशान भाई आपने, निस्संदेह पढ़ने वालों को फायदा होगा

  8. मनोज चौहान says:

    बेहद उम्दा ग़ज़ल…मौजूद परिदृश्य में गाँव भी शहरीकरण की होड़ से अछूते नहीं रहे है,इसी को ग़ज़ल के पहले शेयर में खूबसूरती से बयान किया गया है
    “गांव को शहरी जीवन दे गया
    कौन इतना अजनबीपन दे गया ।”

    जर,जोरू और जमीन भाई को भाई से अलग कर देती है,इसी यथार्थ को उजागर करता शेयर:

    “एक गज टुकड़ा जमीं का देखिए
    भाई को भाई से अनबन दे गया ।”

    ग़ज़ल का हर एक शेयर बहुत कुछ कह जाता है और सोचने पर बाध्य करता है । अनमोल जी को इस सुंदर ग़ज़ल के लिए बधाई और भविष्य के लिए शुभकामनाएं…💐💐💐

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *