शिज्जु शकूर

तुम्हारी याद में इक रात रुखसत और हो जाती

तुम्हारी याद में इक रात रुखसत और हो जाती
तो फिर दुनिया के कहने को हिक़ायत और हो जाती

मेरी जाँ को ऐ मालिक तूने बख़्शी नेमतें क्या-क्या
बस उनके दिल में भी पैदा बसीरत और हो जाती

नहीं रहता निशाँ तक मेरे घर का ऐसा लगता है
अगर मुँह खोलने की इक हिमाक़त और हो जाती है

मैं अपनी ज़िन्दगी तो जी चुका ये इल्तिज़ा है अब
मेरे लख़्त-ए-जिगर पर तेरी रहमत और हो जाती

बड़ी मुश्किल से मिलते हैं हमें लम्हात जीने को
न कहना ये कि जी लेते जो फुर्सत और हो जाती

Meaning:
 हिक़ायत - कहानी, बसीरत - दिव्य-दृष्टि, लख़्ते जिगर – जिगर का टुकड़ा

You may also like...

1 Comment

  1. दिनेश कुमार says:

    मैं अपनी ज़िन्दगी तो जी चुका ये इल्तिज़ा है अब
    मेरे लख़्त-ए-जिगर पर तेरी रहमत और हो जाती

    वाह वाह वाह ।। शानदार ग़ज़ल।शिज्जु भाई।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *