खुर्शीद ख़ैराड़ी

तेरा क्या था गया जो खो फ़क़ीरे – ख़ुर्शीद ख़ैराड़ी

तेरा क्या था गया जो खो फ़क़ीरे
तसल्ली ओढ़कर तू सो फ़क़ीरे

भला कैसे क़बूलें भोर का सच
है जस का तस अँधेरा तो फ़क़ीरे

हैं झूठे जाति-मज़हब के ये झगड़े
निभाना आदमीयत को फ़क़ीरे

हर इक शय खाक़ में इक दिन मिलेगी
तू इतनी हसरतें मत बो फ़क़ीरे

फिर आईने के सच को झूठ कहना
तू अपने दाग़ पहले धो फ़क़ीरे

कटेगी ज़िन्दगी हँसकर मज़े से
अगर तुझको है रोना रो फ़क़ीरे

कर अपनी जात की पहचान ‘खुरशीद’
फ़क़ीरा है, फ़क़ीरा हो फ़क़ीरे

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