- अय्यूब खान "बिस्मिल"

दिखाने को अक्सर वो हँसता बहुत है – अय्यूब ख़ान “बिस्मिल”

दिखाने को अक्सर वो हँसता बहुत है
ग़मे ज़ीस्त से जो शनासा बहुत है

यूँ ज़ख़्मों से अपना भी नाता बहुत है
मगर दर्द दिल में छुपाया बहुत है

मुहब्बत तो कर ली खुले आम लेकिन
ज़माने की रस्मों से सहमा बहुत है

करेगा भला कैसे सैराब हमको
समंदर है लेकिन वो खारा बहुत है

तुम आकर कभी हाले दिल पूछ लेना
मेरे ग़म का ये भी मुदावा बहुत है

उन्हें भूल कर जी तो सकता हूँ मैं भी
मगर टूट जाने का ख़तरा बहुत है

के हिम्मत ही ले जायेगी पार तुम को
अगर दूर तुमसे किनारा बहुत है

फ़िज़ूल अब न कहना मियाँ शायरी को
अदीबों से देखो उजाला बहुत है

ग़ज़ल एक कहने की ख़ातिर ये “बिस्मिल”
लहू अपने दिल का जलाता बहुत है

अय्यूब ख़ान “बिस्मिल”
ग़मेज़ीस्त=ज़िन्दगी की परेशानियाँ, सैराब=तृप्त, मुदावा=इलाज,

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *