शिज्जु शकूर

देखा है यूँ भी तज़्रबा करके

लफ़्जों से दर्द की दवा करके
देखा है यूँ भी तज़्रबा करके

तुम पे दहशत कोई मुसल्लत थी
करना क्या था तुम आए क्या करके

खींचता हूँ हयात को मैं फ़क़त
कट रही है खुदा खुदा करके

अपने माज़ी से है सवाल मेरा
क्या मिला उनसे राबिता करके

होश आ जाए नामुरादों को
देखिए मुहतरम दुआ करके

खिड़कियाँ खोल दी शबिस्ताँ की
दिल से सपनो को अब जुदा करके

दस्तबरदार तुमसे हो जाऊँ
सोचा था मैंने हौसला करके

तज़्रबा – अनुभव, मुसल्लत – हावी होना, हयात – ज़िन्दगी, फ़क़त – केवल
माज़ी – अतीत, राबिता – संबंध, शबिस्ताँ – शयन कक्ष, दस्त-बरदार – विरक्त

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4 Comments

  1. Ravi says:

    शिज्‍जू भाई बेहतरीन गजल कही है आपने दिली मुबारक बाद कुबूल करें

    1. goghazald says:

      बहुत बहुत शुक्रिया रवि भैया,

  2. दिनेश कुमार says:

    बहुत ख़ूब शिज्जु भाई। अच्छे अशआर हुए हैं। वाह वाह।

  3. goghazald says:

    बहुत बहुत शुक्रिया दिनेश भाई नवाज़िश

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