शिज्जु शकूर

पत्ता था, सब्ज़, टूटके खिड़की में आ गया

पत्ता था, सब्ज़, टूटके खिड़की में आ गया
हस्ती शजर की बाकी है मुझको बता गया

माना हवाएँ तेज़ हैं मेरे खिलाफ़ भी
लेकिन जुनून लड़ने का इस दिल पे छा गया

खोने को पास कुछ भी नहीं था हयात में
किसकी तलाफ़ी हो अभी तक मेरा क्या गया

शायद ये दुनिया मेरे लिए थी नहीं कभी
फिर शिकवा क्यों करुँ कि खुदा फ़ैज़ उठा गया

ख़्वाबों को ज़िन्दा करके भी क्या होता, दोस्तो!
मेरा जो वक्त था वो तो कब का चला गया

Meaning:
तलाफ़ी – क्षतिपूर्ति, फ़ैज़ – अनुकम्पा

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2 Comments

  1. Ayub Khan says:

    वाह क्या कहने जंकब

    1. Ayub Khan says:

      क्या कहने हैं जनाब

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