- शिज्जु शकूर

मैं जैसे-तैसे किसी बद-नज़र से निकला था

मैं जैसे-तैसे किसी बद-नज़र से निकला था
कोई बला थी मैं जिसके असर से निकला था

तू संग ओ खार की बातें तो कर रहा है बता
कि पाँव बरहना कब अपने घर से निकला था

सुना है मैंने कि कल उसपे संगबारी हुई
मगर वो पहले भी तो उस नगर से निकला था

बुझा-बुझा सा नज़र आ रहा था सूरत से
कि इक सितारा जो बज़्म ए क़मर से निकला था

तमाम चेहरों पे तासीर अपनी छोड़ गया
वो खून जो मेरे ज़ख़्म ए जिगर से निकला था

कदम कदम पे मेरे किस्से बिखरे होंगे ‘शकूर’
लुटा के अपना जहाँ मैं जिधर से निकला था

पाँव बरहना – नंगे पैर, संगबारी – पत्थरों की बारिश
तासीर – प्रभाव

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