- त्रिवेणी पाठक

ये न हो जाए कि सन्यास से हो कर गुज़रूँ – त्रिवेणी पाठक

ये न हो जाए कि सन्यास से हो कर गुज़रूँ
ज़िन्दगी, जब भी तेरे पास से हो कर गुज़रूँ

इक तो ये ज़िद कि मेरे लॉन में पत्थर भी बिछें
उस पे हसरत कि हरी घास से हो कर गुज़रूँ

आम इंसान हूँ खुद पर से भरोसा न उठे
राह में जब भी किसी ख़ास से हो कर गुज़रूँ

सोचता हूँ कि कहीं जिस्म न आड़े आये
जब तेरे शिद्दत-ए-एहसास से हो कर गुज़रूँ

एक क़तरा हूँ तेरे सामने, लेकिन, दरिया
चाहता हूँ कि तेरी प्यास से हो कर गुज़रूँ

1 thought on “ये न हो जाए कि सन्यास से हो कर गुज़रूँ – त्रिवेणी पाठक

  1. एक क़तरा हूँ तेरे सामने, लेकिन, दरिया
    चाहता हूं कि तेरी प्यास से हो कर गुजरने

    क्या नायाब शे_र कहा है, पाठक जी ! ज़िन्दाबाद

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