दिनेश कुमार बंसल

ख़तरे में जब वज़ीर था प्यादे बदल गए – दिनेश कुमार

ख़तरे में जब वज़ीर था प्यादे बदल गए
मौक़ा परस्त दोस्त थे पाले बदल गए

आये न लौट कर वे नशेमन में फिर कभी
उड़ने को पर हुए तो परिन्दे बदल गए

होंठों पे इनके आज खिलौनों की ज़िद नहीं
ग़ुरबत का अर्थ जान के बच्चे बदल गए

हालाँकि मैं वही हूँ मेरे भाई भी वही
घर जब बँटा तो ख़ून के रिश्ते बदल गए

ढलने पे आफ़ताब है मेरे नसीब का
देखो ये मेरी आँखों के तारे बदल गए

लहजे में गुल-फ़िशानी न रंगे-जदीदियत
शेरो-सुख़न के सारे सलीक़े बदल गए

सागर को फ़त्ह करने चले थे तो नाख़ुदा
तूफ़ाँ को देखते ही इरादे बदल गए

मुद्दत के बाद देखा जो कल मैंने आइना
दिल कह उठा ‘दिनेश’ तुम इतने बदल गए

नशेमन – घोसला, रंगे-जदीदियत – नवीनता के रंग

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