- शिज्जु शकूर

ख़मोशी तेरी फितरत है

ख़मोशी तेरी फितरत है? नहीं तो
या दिल में कोई दहशत है? नहीं तो

तुम्हारे क़त्ल की बातें हुई थीं
किसी दुश्मन की हरकत है? नहीं तो

फ़क़त बातों के दम पर राज करना
ये अपनी-अपनी किस्मत है? नहीं तो

बराबर सबको शीशे में उतारा
तो क्या ये भी तिजारत है? नहीं तो

हवा के रुख से घबराना या डरना
यही क्या तेरी हिम्मत है? नहीं तो

किसी पर अब भरोसा ही नहीं है
तुम्हारी भी ये हालत है? नहीं तो

किसी झूठी खबर पर कान देना
तुम्हें क्या इतनी फुर्सत है? नहीं तो

फ़क़त – सिर्फ(Only), तिजारत – व्यापार(Business)

शिज्जु शकूर

1 thought on “ख़मोशी तेरी फितरत है

  1. बहुत अच्छी तरही ग़ज़ल हुई है…मुबारकबाद

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