दिनेश कुमार बंसल

मिसाल ए ख़ाक सभी वक़्त के ग़ुबार में थे – दिनेश कुमार

कैथल, हरियाणा के शायर दिनेश बंसल जी से मेरी रूबरू मुलाकात कभी नहीं हुई है। मैंने उनको जितना भी जाना है उनकी ग़ज़लों से जाना है; उनकी ग़ज़लें उनके व्यक्तित्व का परिचायक हैं। स्वभाव से मितभाषी दिनेश बंसल जी की ग़ज़लें खूब बोलती हैं। श्री दिनेश जी ओपन बुक्स ऑनलाइन डॉट कॉम पर भी सक्रिय हैं। पेश आपके सामने उनकी एक जदीद ग़ज़ल।
शिज्जु शकूर

मिसाल ए ख़ाक सभी वक़्त के ग़ुबार में थे
न जाने कौन थे हम और किस दयार में थे

न शख़्सियत के सभी रंग इश्तिहार में थे
जो रहनुमा थे सियासत के कारो-बार में थे

अँधेरा शह्र में बे-ख़ौफ़ रक़्स करता रहा
चराग़ सारे हवाओं के इख़्तियार में थे

बताओ मंज़िल ए मक़सूद किस तरह मिलती
तरह-तरह के मनाज़िर जो रहगुज़ार में थे

निशान-ए-आब नहीं था वहाँ पे दूर तलक
हयात ओ मर्ग के हम ऐसे रेग-ज़ार में थे

न माँगने की ज़रूरत न ख़्वाहिश ए ज़र थी
कि हम शुमार गदा में न शहरयार में थे

हक़ीक़तों की तपिश ने जलाया इनका बदन
हसीन ख़्वाब नज़र-दर-नज़र मज़ार में थे

ख़िज़ाँ ‘दिनेश’ दबे पाँव दर पे आई थी
चमन के फूल अभी लज़्ज़त ए बहार में थे

Meanings:
 मिसाल ए ख़ाक़ - धूल की तरह, दयार - मकान, रक्स - नाच
 मनाज़िर - मंज़र का बहुवचन, निशान ए आब - पानी का निशान
 हयातो मर्ग - जीवन और मृत्यु, रेगज़ार - रेगिस्तान, ख़्वाहिश ए ज़र - धन की इच्छा
 गदा - भिखारी, शहरयार - बादशाह,

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