समीर परिमल

जहाँ के रिवाजों की ऐसी की तैसी – समीर परिमल

पटना(बिहार) के श्री समीर परिमल जी वरिष्ठ ग़ज़लकार हैं, जो समाज में व्याप्त विसंगतियाँ चाहे वो सियासी हो या सामाजिक, की पुरज़ोर मुख़़ालिफत करते हैं। उनकी ग़ज़लें सत्य को ज़ोरदार तरीके से सामने रखती हैं।
शिज्जु शकूर

जहाँ के रिवाजों की ऐसी की तैसी
ज़मीं के ख़ुदाओं की ऐसी की तैसी

पतीली है खाली वो ख़ामोश चूल्हा
बहारों, नज़ारों की ऐसी की तैसी

ज़ुबाँ पे शहद, आस्तीनों में ख़ंजर
सियासी अदाओं की ऐसी की तैसी

बनाएँगे हम राह ख़ुद आसमाँ तक
सभी रहनुमाओं की ऐसी की तैसी

जो कहते रहे हैं गुनहगार हमको
वो सुन लें, गुनाहों की ऐसी की तैसी

मेरे दिल तड़पकर यूँ ही जान दे दे
तेरी सर्द आहों की ऐसी की तैसी

जवाबों की कोई कमी तो नहीं पर
तुम्हारे सवालों की ऐसी की तैसी

मसीहा की रग-रग में है ज़ह्र इतना
दवाओं, दुआओं की ऐसी की तैसी

ज़मीं प्यास से मर रही है तड़पकर
गरजती घटाओं की ऐसी की तैसी

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4 Comments

  1. Priti Sen says:

    निहायत ही सुलझे हुए ग़ज़लकार हैं समीर परिमल जी… बहुत खूबसूरत और जानदार होती हैं इनकी लिखी ग़ज़लें.. मेरी अनेक शुभकामनाएं!!

  2. Priti Sen says:

    निहायत ही सुलझे हुए ग़ज़लकार हैं समीर परिमल जी… इनकी लिखी ग़ज़लें बेहद खूबसूरत एवं जानदार होती हैं
    मेरी अनेक शुभकामनाएं

  3. गीतकार राकेश नाजुक says:

    बहुत खूब भैया

  4. रवि शुक्‍ल says:

    समीर परिमल जी को आज पहली बार पढ़ा इसके लिये शिज्‍जु भाई का शुक्रिया । समीर साहब के तेवर बहुत तीखे पर लहजा सधा हुआ लगा बधाई इस उम्‍दा गजल के लिये

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