जहाँ के रिवाजों की ऐसी की तैसी – समीर परिमल

पटना(बिहार) के श्री समीर परिमल जी वरिष्ठ ग़ज़लकार हैं, जो समाज में व्याप्त विसंगतियाँ चाहे वो सियासी हो या सामाजिक, की पुरज़ोर मुख़़ालिफत करते हैं। उनकी ग़ज़लें सत्य को ज़ोरदार तरीके से सामने रखती हैं। –शिज्जु शकूर जहाँ के रिवाजों की ऐसी की तैसी ज़मीं के ख़ुदाओं की ऐसी की तैसी पतीली है खाली वो …

कितने अच्छे थे मेरा ऐब बताने वाले

कितने अच्छे थे मेरा ऐब बताने वाले वो मेरे दोस्त मुझे राह दिखाने वाले वक्त ने, काश! उन्हें रुकने दिया होता ज़रा साथ ही छोड़ गए साथ निभाने वाले मुफ़लिसी मक्र की छाई है सियाही अब भी पर बताओ हैं कहाँ शम्अ जलाने वाले अपने क़ातिल से शिकायत नहीं कोई मुझको कर गए ग़र्क मेरी कश्ती, …

पत्ता था, सब्ज़, टूटके खिड़की में आ गया

पत्ता था, सब्ज़, टूटके खिड़की में आ गया हस्ती शजर की बाकी है मुझको बता गया माना हवाएँ तेज़ हैं मेरे खिलाफ़ भी लेकिन जुनून लड़ने का इस दिल पे छा गया खोने को पास कुछ भी नहीं था हयात में किसकी तलाफ़ी हो अभी तक मेरा क्या गया शायद ये दुनिया मेरे लिए थी …

दिल ए नाकाम पर हँसी आई

दिल ए नाकाम पर हँसी आई तेरे इलज़ाम पर हँसी आई जिस मुहब्बत की आरज़ू थी बहुत उसकेे अंजाम पर हँसी आई दास्ताँ अपनी लिखने बैठा था अपने इस काम पर हँसी आई जिसमें तुमने कभी रखा था मुझे आज उस दाम पर हँसी आई मेरे क़ातिल का तज़किरा जो हुआ तो हर इक नाम …

मैं जैसे-तैसे किसी बद-नज़र से निकला था

मैं जैसे-तैसे किसी बद-नज़र से निकला था कोई बला थी मैं जिसके असर से निकला था तू संग ओ खार की बातें तो कर रहा है बता कि पाँव बरहना कब अपने घर से निकला था सुना है मैंने कि कल उसपे संगबारी हुई मगर वो पहले भी तो उस नगर से निकला था बुझा-बुझा सा …

उर्दू अल्फ़ाज़ के हिंदी अर्थ

शब्द संकेत फ़ारसी- फा० /अरबी-अर० स्त्री लिंग–स्त्री/पुलिंग–पु० अंगसी انگسی(स्त्री० फ़ा०- अंग्सी) शहद, मधु अंगुश्त انگشت(पु० फ़ा० ) उँगली अंगुश्तनुमा-انگشت نما(फा०) जिस की ओर लोगों की उंगलियाँ उठे,किसी काम में विशेषतःकिसी बुरे काम में प्रसिध्द। अंगुश्तनुमाई-انگشت نمائ (स्त्री फ़ा )किसी की ओर उंगली उठाना-किसी की ओर विशेषतःकोई बुरा काम करने वाले की ओर लोगों का उंगलियाँ …

दरिया मेरे क़रीब जो आकर सिमट गया

दरिया मेरे क़रीब जो आकर सिमट गया तनहा मै अपने आपसे खुद ही लिपट गया पन्ने कई मरोड़ के फेंके ज़मीन पर नाक़ामियों से जैसे ये कमरा ही पट गया जब भी मिले हरीफ़ मुझे अपने ही मिले दिल से मुहब्बतों का यूँ अहसास घट गया आरी बहुत ही तेज़ थी लालच की इसलिए आया …

मिसाल ए ख़ाक सभी वक़्त के ग़ुबार में थे – दिनेश कुमार

कैथल, हरियाणा के शायर दिनेश बंसल जी से मेरी रूबरू मुलाकात कभी नहीं हुई है। मैंने उनको जितना भी जाना है उनकी ग़ज़लों से जाना है; उनकी ग़ज़लें उनके व्यक्तित्व का परिचायक हैं। स्वभाव से मितभाषी दिनेश बंसल जी की ग़ज़लें खूब बोलती हैं। श्री दिनेश जी ओपन बुक्स ऑनलाइन डॉट कॉम पर भी सक्रिय …

बस किसी अवतार के आने का रस्ता देखना – निलेश ‘नूर’

इंदौर के श्री निलेश शेवगाँवकर ‘नूर’ जी के ग़ज़ल कहने का अंदाज़ ही सबसे जुदा है, उनका लहजा समकालीन ग़ज़लकारों के बीच उन्हें अलग पहचान देता है। निलेश नूर साहब की ये ग़ज़ल एक आईना है; आज की परिस्थितियों का अक्स इसमें दिखाई देता है –शिज्जु शकूर बस किसी अवतार के आने का रस्ता देखना …