किस-किस बात का रोना रोया जाए – खुर्शीद खैराड़ी

किस-किस बात का रोना रोया जाए दरिया में हर ग़म को डुबोया जाए छाँट लिए जाएँ काँटे आँचल के फूलों का इक हार पिरोया जाए अपने जैसा तो न ज़माना होगा यार ज़माने जैसा होया जाए हमने जो अहसान किए लोगों पर इस गठरी को कब तक ढोया जाए सूख गई है रिश्तों की हरियाली …

तेरा क्या था गया जो खो फ़क़ीरे – ख़ुर्शीद ख़ैराड़ी

तेरा क्या था गया जो खो फ़क़ीरे तसल्ली ओढ़कर तू सो फ़क़ीरे भला कैसे क़बूलें भोर का सच है जस का तस अँधेरा तो फ़क़ीरे हैं झूठे जाति-मज़हब के ये झगड़े निभाना आदमीयत को फ़क़ीरे हर इक शय खाक़ में इक दिन मिलेगी तू इतनी हसरतें मत बो फ़क़ीरे फिर आईने के सच को झूठ …

रेत पर फूल खिलाने आए – जयनित मेहता

रेत पर फूल खिलाने आए दश्त में कितने दीवाने आए मिल गया राह में बचपन का यार याद फिर गुज़रे ज़माने आए धूप के पंख निकल आए जब कुछ शजर जाल बिछाने आए एक दिन बेखुदी जो ले डूबी तब मेरे होश ठिकाने आए वक़्त बेवक्त भड़ककर, आँसू ग़म की सरकार गिराने आए नाम लिक्खा …

दिखाने को अक्सर वो हँसता बहुत है – अय्यूब ख़ान “बिस्मिल”

दिखाने को अक्सर वो हँसता बहुत है ग़मे ज़ीस्त से जो शनासा बहुत है यूँ ज़ख़्मों से अपना भी नाता बहुत है मगर दर्द दिल में छुपाया बहुत है मुहब्बत तो कर ली खुले आम लेकिन ज़माने की रस्मों से सहमा बहुत है करेगा भला कैसे सैराब हमको समंदर है लेकिन वो खारा बहुत है …

वफ़ा की उनसे चलो फिर से आरज़ू कर लें – अय्यूब खान “बिस्मिल”

वफ़ा की उनसे चलो फिर से आरज़ू कर लें यूँ तार तार मुहब्बत की आबरू कर लें हुआ जो चाक ये दिल क्यूँ न हम रफू कर लें बुलाओ उनको के फिर उनसे गुफ्तगू कर लें हाँ उनके ख़त को लगाने से क़ब्ल हाथ अपना लिया है पानी के पहले तो हम वुज़ू कर लें …

बात से बात निकालो तो कोई बात बने – ख़ुर्शीद खैराड़ी

जोधपुर के रहने वाले श्री खुर्शीद खैराड़ी जितनी कमाल की ग़ज़ले कहते हैं उतने ही सशक्त छंदकार भी हैं। इनका पूरा नाम महावीर सिंह हैं, आप भारतीय रेलवे में पर्यपेक्षक के पद पर कार्यरत हैं। इनकी रचनाएँ विभिन्न प्रिंट व वेब पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। –शिज्जु शकूर बात से बात निकालो तो कोई …

खून ए दिल से लफ़्ज़ मुअत्तर करता है – के पी अनमोल

खून ए दिल से लफ़्ज़ मुअत्तर करता है क्या-क्या जादू एक सुखनवर करता है रात-रात भर खुद ही खुद में जग-जगकर दुनिया भर की सोच मुनव्वर करता है मेरा बेड़ा मँझधारों में उलझा के एक छलावा रोज़ समंदर करता है पेशानी पर बोसा तेरी चाहत का दिल पर कितने जंतर-मंतर करता है गैरों को मुस्कान …

क़लम से छोड़ दिए कुछ निशान काग़ज़ पर – के पी अनमोल

क़लम से छोड़ दिए कुछ निशान काग़ज़ पर करेगा याद हमें अब जहान काग़ज़ पर मिला है जितना तज़ुर्बा हयात से हमको लिखा है उसको सुखन की ज़ुबान काग़ज़ पर बहुत हुआ कि हक़ीक़त की छत पे आ जाओ भरी है तुमने अभी तक उड़ान काग़ज़ पर यहाँ ग़रीब के हिस्से में झोंपड़ी भी नहीं …

आंखों की वीरानी पढ़ कर देखो ना- राज़िक अंसारी

इंदौर के रहने वाले वरिष्ठ शायर मोहतरम राज़िक अंसारी जी उर्दू गज़लों में अच्छा खासा दख्ल रखते हैं, वे वर्षों से विभिन्न मंचों पर सक्रिय हैं। उनकी गज़लों को रेख्ता डॉट ओआरजी जैसे प्रतिष्ठित साइट में जगह मिली है। वे बदलते दौर के साथ अपनी ग़ज़लों को लेकर चले हैं, जो यह साबित करने के …

जब तअल्लुक़ आपसे बिल वास्ता हो जायेगा- अय्यूब खान “बिस्मिल”

जयपुर के जनाब अय्यूब खान “बिस्मिल” न सिर्फ इंटरनेट बल्कि मंचों और अपने क्षेत्र के एक सक्रिय ग़ज़लकार हैं, जो अपनी सशक्त ग़ज़लों के ज़रिए अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराते आ रहे हैं। उर्दू ग़ज़लकारों के दरमियान अय्यूब खान “बिस्मिल” साहिब अपनी एक अलग ही पहचान रखते हैं। –शिज्जु शकूर जब तअल्लुक़ आपसे बिल वास्ता …