एक बार और तेरे नाम पे वारा जाऊँ – त्रिवेणी पाठक

एक बार और तेरे नाम पे वारा जाऊँ सोचता हूँ कि तेरी सिम्त दुबारा जाऊँ तू मेरी रूह में शामिल हो हवा की मानिंद मै तेरे जिस्म की मिट्टी में उतारा जाऊँ उम्र भर हिज्र की घाटी में रहा बेआवाज़ लाख चाहा कि पुकारूँ या पुकारा जाऊँ इश्क ग़र खेल ही ठहरा तो चलो खेल …

ये न हो जाए कि सन्यास से हो कर गुज़रूँ – त्रिवेणी पाठक

ये न हो जाए कि सन्यास से हो कर गुज़रूँ ज़िन्दगी, जब भी तेरे पास से हो कर गुज़रूँ इक तो ये ज़िद कि मेरे लॉन में पत्थर भी बिछें उस पे हसरत कि हरी घास से हो कर गुज़रूँ आम इंसान हूँ खुद पर से भरोसा न उठे राह में जब भी किसी ख़ास …

बातों-बातों में किसी ख़्वाब का नक्शा बन जाए – त्रिवेणी पाठक

बातों-बातों में किसी ख़्वाब का नक्शा बन जाए दो क़दम साथ चलो क्या पता रस्ता बन जाए मुझ पे लानत जो तुम्हें सोच के पाऊँ न सुक़ून वस्ल भी क्या कि जो दुनिया में तमाशा बन जाए इश्क़ वो है कि मै भर आँख जिसे भी देखूँ हर वो सूरत मेरी ख़ातिर तेरा चेहरा बन …

तरतीब से सजे दर-ओ-दीवार घर नहीं – दिनेश कुमार

तरतीब से सजे दर-ओ-दीवार घर नहीं सुख-दुख में तेरे साथ अगर हमसफ़र नहीं ऐसा नहीं कि राहे-सफ़र में शजर नहीं आसाँ ये ज़िन्दगी की मगर रहगुज़र नहीं उपदेश दूसरों को सभी लोग दे रहे ख़ुद उन पे जो अमल करे ऐसा बशर नहीं औरों के रंजो-ग़म से है अब किसको वास्ता पहले सी रौनकें किसी …

ख़तरे में जब वज़ीर था प्यादे बदल गए – दिनेश कुमार

ख़तरे में जब वज़ीर था प्यादे बदल गए मौक़ा परस्त दोस्त थे पाले बदल गए आये न लौट कर वे नशेमन में फिर कभी उड़ने को पर हुए तो परिन्दे बदल गए होंठों पे इनके आज खिलौनों की ज़िद नहीं ग़ुरबत का अर्थ जान के बच्चे बदल गए हालाँकि मैं वही हूँ मेरे भाई भी …