मस्ती-भरी वो उम्र सुहानी किधर गयी – दरवेश भारती

मस्ती-भरी वो उम्र सुहानी किधर गयी मस्ती-भरी वो उम्र सुहानी किधर गयी, श्री दरवेश भारती जी यह ग़ज़ल उन सुहाने दिनों की याद दिलाती है जो हर व्यक्ति अपने साथ संजोकर रखना चाहता है। श्री दरवेश भारती जी ग़ज़ल की खासियत ही है कि वे बिना भारी-भरकम शब्दों का प्रयोग करे गहरी बात बड़े आराम …

बुलंदी हो बुलंदी-सी तो ये मशहूर करती है- दरवेश भारती

बुलंदी हो बुलंदी-सी तो ये मशहूर करती है- दरवेश भारती श्री दरवेश भारती जी सिर्फ एक नाम नहीं बल्कि अपने आप में पूरा युग हैं, वे विगत कई दशकों से ग़ज़ल की दुनिया में सक्रिय हैं। उर्दू शब्दों के साथ आम बोलचाल के शब्दों को खूबसूरती से अपनी ग़ज़लों में समाहित कर आज के परिवेश …

नारे विकासवाद के लाते रहे बहुत – दरवेश भारती

नारे विकासवाद के लाते रहे बहुत नारों को नारेबाज़ भुनाते रहे बहुत सचमुच के मोतियों से भरा घर मिला उन्हें जो मोतियों-सी बातें लुटाते रहे बहुत हँस-हँस के जो भी करते रहे मर्हलों को सर एज़ाज़ उम्र-भर वही पाते रहे बहुत ता’बीर पा सका न कोई, बात है अलग आँखों में ख़्वाब यूँ तो समाते …

ज़ह्न में यूँ तो रौशनी है बहुत – समर कबीर

मोहतरम जनाब समर कबीर साहब उज्जैन के वरिष्ठ व उस्ताद ग़ज़लकार हैं जो कई वर्षों से ग़ज़ल की दुनिया में सक्रिय हैं। उनकी पकड़ पर ग़ज़ल के अरूज पर जितनी मजबूत है उतनी उर्दू ज़बान पर भी। वे इस दौर के उर्दू अदब में अच्छा खासा दख्ल रखते हैं। उन्हें अदब की खिदमात के लिए …