समर कबीर

ज़ह्न में यूँ तो रौशनी है बहुत – समर कबीर

मोहतरम जनाब समर कबीर साहब उज्जैन के वरिष्ठ व उस्ताद ग़ज़लकार हैं जो कई वर्षों से ग़ज़ल की दुनिया में सक्रिय हैं। उनकी पकड़ पर ग़ज़ल के अरूज पर जितनी मजबूत है उतनी उर्दू ज़बान पर भी। वे इस दौर के उर्दू अदब में अच्छा खासा दख्ल रखते हैं। उन्हें अदब की खिदमात के लिए कई बार सम्मानित किया गया है।

ज़ह्न में यूँ तो रौशनी है बहुत
पर जमी इसमें गंदगी है बहुत

इतना आसाँ नहीं ग़ज़ल कहना
ये लहू दिल का चूसती है बहुत

एक एक पल हज़ार साल का है
चार दिन की भी ज़िन्दगी है बहुत

चींटियाँ सी बदन पे रेंगती हैं
लम्स में तेरे चाशनी है बहुत

फ़न ग़ज़ल का “समर” सिखाने को
एक ‘दरवेश भारती’ है बहुत

लम्स-स्पर्श

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4 Comments

  1. समर कबीर says:

    बहुत बहुत शुक्रिया जनाब शिज्जु शकूर साहिब ।

  2. के. पी. अनमोल says:

    एक ‘दरवेश भारती’ है बहुत….ज़िन्दाबाद

    बहुत बढ़िया

  3. हरिवल्लभ says:

    वाह कमाल बढ़िया

  4. राज़िक़ अंसारी says:

    बहुत खूब

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