Ghazal, Subhash Pathak, Zia
सुभाष पाठक 'ज़िया'

ये जो आँखों से अश्कबारी है – सुभाष पाठक ‘ज़िया’

ये जो आँखों से अश्कबारी है

युवा शाइर सुभाष पाठक ‘ज़िया’ की ग़ज़लें मैं सोशल मीडिया में लगातार पढ़ता रहता हूँ। वह युवा और संयत शाइर हैं जो आभासी दुनिया के साथ-साथ वास्तविक अदब की दुनिया में लगातार सक्रिय हैं। सुभाष पाठक जी की ग़ज़लों को उनके पाठकों की मुहब्बत हासिल है। उनके फ़िक्रो फ़न की एक मिसाल यह गज़ल है। यह परंपरागत लहजे में लिखी गई ग़ज़ल उनकी प्रतिभा की एक झलक प्रस्तुत करती है।
-शिज्जु शकूर, ग़ज़ल-गो के  लिए

Ghazal, Subhash Pathak, Ziya

ये जो आँखों से अश्कबारी है,
मेरे ख़्वाबों की आबयारी है,

ख़ुश्क दामन पे अश्क बरसा कर,
इक नदी सहरा से गुज़ारी है,

रौशनी में चराग़ का मतलब,
कुछ नहीं, तीरगी से यारी है,

हम वो पत्थर उठाये फिरते हैं
मीर’ जिसको कहे कि भारी है,

देख बेवा सी लगती है दीवार,
तेरी तस्वीर क्या उतारी है,

ऐ ‘ज़िया’ कुछ नहीं मेरा मुझमें,
दिल तुम्हारा है जाँ तुम्हारी है,

अश्क़बारी – अश्रु-वर्षा, आबयारी – सिंचाई, ख़ुश्क़ – सूखा
सहरा – रेगिस्तान, तीरगी – अंधेरा

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