ghazal ehtaram islam
एहतराम इस्लाम

आँखो में भड़कती हैं आक्रोश की ज्वालाएँ – एहतराम इस्लाम

आँखो में भड़कती हैं

मोहतरम एहतराम इस्लाम साहिब की किताब ‘है तो है’ से एक ग़ज़ल

ghazal ehtaram islam

आँखो में भड़कती हैं आक्रोश की ज्वालाएँ
हम लांघ गये हैं शायद संतोष की सीमाएँ

पग-पग पे प्रतिष्ठित हैं पथ-भ्रष्ट दुराचारी
इस नक्शे पे हम खुद को किस बिन्दु पे दर्शाएँ

अनुभूति की दुनिया में भूकम्प-सा आया है
आधार न खो बैठें निष्ठाएँ, प्रतिष्ठाएँ

बाँसों का घना जंगल कुछ काम न आएगा
हाँ! खेल दिखा देंगी कुछ अग्नि शलाकाएँ

सीनों से धुआँ उठना कब बंद हुआ कहिए
कहने को बदलती ही रहती हैं व्यवस्थाएँ

वीरानी बिछा दी है मौसम के बुढ़ापे ने
कुछ गुल न खिला डालें यौवन की निराशाएँ

तस्वीर दिखानी है भारत की तो दिखला दो
कुछ तैरती पतवारें कुछ डूबती नौकाएँ

पग-पग पे प्रतिष्ठित हैं पथ-भ्रष्ट दुराचारी
इस नक्शे पे हम खुद को किस बिन्दु पे दर्शाएँ

एहतराम इस्लाम

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