आँखो में खून देखें तो क़दमों पे सर झुकाएँ – एहतराम इस्लाम

आँखो में खून देखें

पेश है एहतराम इस्लाम साहिब की एक ग़ज़ल-

aankhon mein khoon ghazal ehtaram islam

आँखो में खून देखें तो क़दमों पे सर झुकाएँ
आँसू मिलें तो लोग मुझे ठोकर लगाएँ

ला-हासिली ही ठहरी जो हर बह्स का नसीब
क्या सोचकर किसी से कोई गुफ़्तगू चलाएँ

जाता है सीधा दोस्तो शमशान की तरफ़
इस रास्ते पे आप अगर चल सकें तो आएँ

जब ख़ुद रेज़ा-रेज़ा हुए जा रहे हैं लोग
बिखरे तअल्लुक़ात को कैसे समेट पाएँ

बर्दाश्त कर न सकते थे जब दास्तान ए ग़म
किसने कहा था आप ग़ज़ल मेरी गुनगुनाएँ

ला-हासिली ही ठहरी जो हर बह्स का नसीब
क्या सोचकर किसी से कोई गुफ़्तगू चलाएँ

एहतराम इस्लाम

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