samra
- शिज्जु शकूर

आप ही कोई सूरत बता दीजिए- शिज्जु शकूर

संग राहों से मेरी हटा दीजिए

संग राहों से मेरी हटा दीजिए ये ग़ज़ल मैंने यानि शिज्जु शकूर ने सर्वप्रधम छत्तीसगढ़ उर्दू तंज़ीम के लिए कही थी फिर इसे ओपनबुक्स ऑनलाईन डॉट कॉम के मंच पर इस्लाह के लिए रखा था। यह मैंने बहर 212 212 212 212 यानि बहर ए मुतदारिक मुसम्मन सालिम पर कही है। यह सात मूल बहरों में से एक है। इस ग़ज़ल पर आपकी तवज्जो चाहूँगा।

Poetry Shijju Shakoor, ghazal-go.com
Sang rahon se meri hataa deejiye

संग राहों से मेरी हटा दीजिए
मुझको जीने का हौसला दीजिए

सुबह होने लगी सूर्य उगने लगा
लौ ज़रा इन दियों की बुझा दीजिए

चलिये मेरा तरीका मुनासिब नहीं
आप ही कोई सूरत बता दीजिए

बोझ उम्मीद का मुझसे उठता नहीं
आइये हाथ थोड़ा लगा दीजिए

एक कर्कश-सी आवाज़ आने लगी
सूखे पत्तों को सारे जला दीजिए

अपनी ही दास्ताँ खुद मैं कैसे कहूँ
आपको सब पता है सुना दीजिए

मुझसे अब ख़्वाब देखा न जाए कोई
इनको नज़रों से मेरी छुपा दीजिए

Meaning:
संग पत्थर

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