ग़ज़ल - राज़िक़ अंसारी
राज़िक अंसारी

आतिश ए ग़म से गुज़रता रोज़ हूँ – राज़िक़ अंसारी

आतिश ए ग़म से गुज़रता रोज़ हूँ

पेश है राज़िक अंसारी जी की ग़ज़ल

ग़ज़ल - राज़िक़ अंसारी

आतिश ए ग़म से गुज़रता रोज़ हूँ
रोज़ मैं जीता हूँ , मरता रोज़ हूँ

जाने कब आवाज़ दे कर रोक ले
उस के कूचे में ठहरता रोज़ हूँ

एक दिन हो जाऊंगा मिट्टी का ढेर
थोड़ा थोड़ा सा बिखरता रोज़ हूँ

है मुझे सच बोलने का शौक़ भी
और अपने ख़ुद से डरता रोज़ हूँ

एक सूरज मेरे अंदर क़ैद है
डूबता हूँ, फिर उभरता रोज़ हूँ

राज़िक़ अंसारी

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