Ashok Anjum, Ghazal, Bahre Mir
अशोक अंजुम

खाना-पीना, हंसी-ठिठोली, सारा कारोबार अलग – अशोक अंजुम

खाना-पीना, हंसी-ठिठोली, सारा कारोबार अलग

अशोक अंजुम जी की ग़ज़लों का अपना अलग ही लुत्फ़ है। भाषा और कहन के हवाले से उनकी हर ग़ज़ल में एक नयापन झलकता है।
पहले इक छत के ही नीचे कितने उत्सव होते थे,
सारी खुशियाँ पता न था यूँ कर देगा बाज़ार अलग, इस शे’र को ही देखिए, यहाँ कॉर्पोरेट संस्कृति के कारण काम के बढ़ते दबाव और उसकी वजह से आज के बिखरते संयुक्त परिवार के प्रति उनकी टीस उभर रही है। अशोक अंजुम जी की ग़ज़लों ने हिन्दी ग़ज़ल को एक अलग ही मुकाम दिया है। उनकी यह ग़ज़ल बहर ए मीर यानि 22 22 121 22 22 22 211 2 पर आधारित है। इस बहर पर अभ्यास करने वाल ग़ज़लकार बतौर नज़ीर इस ग़ज़ल को ले सकते हैं.

Ashok Anjum, Ghazal, Bahre Mir

खाना-पीना, हंसी-ठिठोली, सारा कारोबार अलग
जाने क्या-क्या कर देती है आँगन की दीवार अलग

पहले इक छत के ही नीचे कितने उत्सव होते थे,
सारी खुशियाँ पता न था यूँ कर देगा बाज़ार अलग

पत्नी, बहन, भाभियाँ, ताई, चाची, बुआ, मौसीजी
सारे रिश्ते एक तरफ हैं लेकिन माँ का प्यार अलग

कैसे तेरे-मेरे रिश्ते को मंजिल मिल सकती थी
कुछ तेरी रफ़्तार अलग थी, कुछ मेरी रफ़्तार अलग

जाने कितनी देर तलक दिल बदहवास-सा रहता है
तेरे सब इकरार अलग हैं, लेकिन इक इनकार अलग

अब पलटेंगे, अब पलटेंगे, जब-जब ऐसा सोचा है
‘अंजुम जी’ अपना अन्दाज़ा हो जाता हर बार अलग

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