जौन एलिया: एक अजब गजब शाइर – मुन्तज़िर फ़िरोज़ाबादी

जौन एलिया: एक अजब गजब शाइर जौन एक मुँहफट, बेबाक और बागी शायर थे। आप जौन को जितना पढ़ेंगे उतना जौन खुलते आएँगे। कुछ दिन में आप इस जौन वाइरस से एडिक्टड हो जाएँगे और एक तिश्नग़ी आपका शिकार करने लगेगी। नए शायरों की ग़ज़लें भी अब मीर, मोमिन, ग़ालिब, फ़ैज़, ख़ुमार के आगोश से …

सीने से चिमटा कर रोये – निलेश नूर

सीने से चिमटा कर रोये आदरणीय निलेश “नूर” जी की इस ग़ज़ल के शिल्प पर उस्ताद और वरिष्ठ ग़ज़लकारों नें विस्तार से अपनी बात कही है। उनके अपने तर्क हैं निलेश नूर साहिब के अपने। यदि ग़ज़ल में आप कोई प्रयोग करते हैं तो आपके पास तर्क भी होने चाहिए। मैं निजी तौर पर श्री …

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ये जो आँखों से अश्कबारी है – सुभाष पाठक ‘ज़िया’

ये जो आँखों से अश्कबारी है युवा शाइर सुभाष पाठक ‘ज़िया’ की ग़ज़लें मैं सोशल मीडिया में लगातार पढ़ता रहता हूँ। वह युवा और संयत शाइर हैं जो आभासी दुनिया के साथ-साथ वास्तविक अदब की दुनिया में लगातार सक्रिय हैं। सुभाष पाठक जी की ग़ज़लों को उनके पाठकों की मुहब्बत हासिल है। उनके फ़िक्रो फ़न …

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जो दश्ते-ज़ीस्त से हँस कर गुज़र नहीं सकता – डॉ. मंजु कछावा ‘अना’

जो दश्ते-ज़ीस्त से हँस कर गुज़र नहीं सकता आज हम आपको रू-ब-रू करवाते हैं मरू नगरी बीकानेर की तेजी से लोकप्रिय होती हुई शायरा मोहतरमा डॉ मंजू कच्छावा ‘अना’ साहिबा की ग़ज़ल से। डॉ. मंजू कच्छावा बीकानेर के साहित्यकाश में एक उभरता हुआ नाम है जिन्होंने थोड़े समय में ही अपनी उम्दा लेखनी से एक …

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मौला की रहमतों का है अंजाम आदमी – राजेश कुमारी ‘राज’

मौला की रहमतों का है अंजाम आदमी हाज़िर है देहरादून की शायरा राजेश कुमारी जी की एक ग़ज़ल। अपनी बात कहने के लिए बड़ी आहंग खेज बह्र का सहारा लिया है। मतले से ही एक मेयारी कलाम का अहसास हो जाता है जो शेर दर शेर आगे चलता है। ग़ज़ल शायरा के फ़लसफ़े को बख़ूबी …

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टॉप 10 शेर – एहतराम इस्लाम

टॉप 10 शेर – एहतराम इस्लाम इलाहाबाद में जश्न ए ग़ज़ल कार्यक्रम के दौरान मुझे एहतराम इस्लाम साहिब से पहली बार मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उसी दौरान उनकी ग़ज़लें भी साक्षात सुनने को मिली। जब मैंने पहली दफा एहतराम इस्लाम साहिब की ग़ज़लें पढ़ीं, पहले तो मुझे विश्वास नहीं हुआ कि उदाहरण, जागरण, व्याकरण …

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इन्तिज़ार इन्तिज़ार है तो है – सारथी

इन्तिज़ार इन्तिज़ार है तो है पटना के बैद्यनाथ सारथी ग़ज़लकारों की इस पीढ़ी के सशक्त और प्रतिभाशाली रचनाकार हैं। उन्हें अपनी रचनाओं को सहेजना और सँभालना आता है। किसी भी ग़ज़ल में बहर का आकार या अशआर की तादाद तासीर तय नहीं करती। बल्कि कहन की मजबूती भी ग़ज़ल का मेआर तय करती है। सारथी …

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वक़्ते-क़याम और भी कुछ तो हो सकता था – मुन्तज़िर फ़िरोज़ाबादी

वक़्ते-क़याम और भी कुछ तो हो सकता था मुन्तज़िर साहब उन ग़ज़ल-गो की राह पर हैं, जिनकी ग़ज़लें परम्परा और आधुनिकता के बीच पुल की तरह हैं। शायरी में पारम्परिक लहजे की लचक बरकरार रखते हुए नए समय की बातें करना आसान नहीं होता। इसी मुश्किल काम को अंजाम दे रहे हैं ये। एक मेआरी …

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आप तो रिश्तों में भी चालाकियाँ करते रहे – डॉ. आरती

आप तो रिश्तों में भी चालाकियाँ करते रहे मुज़फ़्फ़पुर(बिहार) निवासी डॉ. श्रीमती आरती कुमारी एक आला दर्ज़े की शायरा हैं। उनकी ग़ज़लों में शिल्प की कसावट तो है ही कहन भी सार्थक है। ग़ज़ल सिर्फ शब्दों को बहर में सजाने का नाम नहीं है। ग़ज़ल तब मुकम्मल(पूर्ण) होती है जब दो मिसरों के बीच जो …

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खाना-पीना, हंसी-ठिठोली, सारा कारोबार अलग – अशोक अंजुम

खाना-पीना, हंसी-ठिठोली, सारा कारोबार अलग अशोक अंजुम जी की ग़ज़लों का अपना अलग ही लुत्फ़ है। भाषा और कहन के हवाले से उनकी हर ग़ज़ल में एक नयापन झलकता है। पहले इक छत के ही नीचे कितने उत्सव होते थे, सारी खुशियाँ पता न था यूँ कर देगा बाज़ार अलग, इस शे’र को ही देखिए, …