नारे विकासवाद के लाते रहे बहुत – दरवेश भारती

नारे विकासवाद के लाते रहे बहुत नारों को नारेबाज़ भुनाते रहे बहुत सचमुच के मोतियों से भरा घर मिला उन्हें जो मोतियों-सी बातें लुटाते रहे बहुत हँस-हँस के जो भी करते रहे मर्हलों को सर एज़ाज़ उम्र-भर वही पाते रहे बहुत ता’बीर पा सका न कोई, बात है अलग आँखों में ख़्वाब यूँ तो समाते …

ज़ह्न में यूँ तो रौशनी है बहुत – समर कबीर

मोहतरम जनाब समर कबीर साहब उज्जैन के वरिष्ठ व उस्ताद ग़ज़लकार हैं जो कई वर्षों से ग़ज़ल की दुनिया में सक्रिय हैं। उनकी पकड़ पर ग़ज़ल के अरूज पर जितनी मजबूत है उतनी उर्दू ज़बान पर भी। वे इस दौर के उर्दू अदब में अच्छा खासा दख्ल रखते हैं। उन्हें अदब की खिदमात के लिए …

एक बार और तेरे नाम पे वारा जाऊँ – त्रिवेणी पाठक

एक बार और तेरे नाम पे वारा जाऊँ सोचता हूँ कि तेरी सिम्त दुबारा जाऊँ तू मेरी रूह में शामिल हो हवा की मानिंद मै तेरे जिस्म की मिट्टी में उतारा जाऊँ उम्र भर हिज्र की घाटी में रहा बेआवाज़ लाख चाहा कि पुकारूँ या पुकारा जाऊँ इश्क ग़र खेल ही ठहरा तो चलो खेल …

ये न हो जाए कि सन्यास से हो कर गुज़रूँ – त्रिवेणी पाठक

ये न हो जाए कि सन्यास से हो कर गुज़रूँ ज़िन्दगी, जब भी तेरे पास से हो कर गुज़रूँ इक तो ये ज़िद कि मेरे लॉन में पत्थर भी बिछें उस पे हसरत कि हरी घास से हो कर गुज़रूँ आम इंसान हूँ खुद पर से भरोसा न उठे राह में जब भी किसी ख़ास …

बातों-बातों में किसी ख़्वाब का नक्शा बन जाए – त्रिवेणी पाठक

बातों-बातों में किसी ख़्वाब का नक्शा बन जाए दो क़दम साथ चलो क्या पता रस्ता बन जाए मुझ पे लानत जो तुम्हें सोच के पाऊँ न सुक़ून वस्ल भी क्या कि जो दुनिया में तमाशा बन जाए इश्क़ वो है कि मै भर आँख जिसे भी देखूँ हर वो सूरत मेरी ख़ातिर तेरा चेहरा बन …

तरतीब से सजे दर-ओ-दीवार घर नहीं – दिनेश कुमार

तरतीब से सजे दर-ओ-दीवार घर नहीं सुख-दुख में तेरे साथ अगर हमसफ़र नहीं ऐसा नहीं कि राहे-सफ़र में शजर नहीं आसाँ ये ज़िन्दगी की मगर रहगुज़र नहीं उपदेश दूसरों को सभी लोग दे रहे ख़ुद उन पे जो अमल करे ऐसा बशर नहीं औरों के रंजो-ग़म से है अब किसको वास्ता पहले सी रौनकें किसी …

ख़तरे में जब वज़ीर था प्यादे बदल गए – दिनेश कुमार

ख़तरे में जब वज़ीर था प्यादे बदल गए मौक़ा परस्त दोस्त थे पाले बदल गए आये न लौट कर वे नशेमन में फिर कभी उड़ने को पर हुए तो परिन्दे बदल गए होंठों पे इनके आज खिलौनों की ज़िद नहीं ग़ुरबत का अर्थ जान के बच्चे बदल गए हालाँकि मैं वही हूँ मेरे भाई भी …

किस-किस बात का रोना रोया जाए – खुर्शीद खैराड़ी

किस-किस बात का रोना रोया जाए दरिया में हर ग़म को डुबोया जाए छाँट लिए जाएँ काँटे आँचल के फूलों का इक हार पिरोया जाए अपने जैसा तो न ज़माना होगा यार ज़माने जैसा होया जाए हमने जो अहसान किए लोगों पर इस गठरी को कब तक ढोया जाए सूख गई है रिश्तों की हरियाली …

तेरा क्या था गया जो खो फ़क़ीरे – ख़ुर्शीद ख़ैराड़ी

तेरा क्या था गया जो खो फ़क़ीरे तसल्ली ओढ़कर तू सो फ़क़ीरे भला कैसे क़बूलें भोर का सच है जस का तस अँधेरा तो फ़क़ीरे हैं झूठे जाति-मज़हब के ये झगड़े निभाना आदमीयत को फ़क़ीरे हर इक शय खाक़ में इक दिन मिलेगी तू इतनी हसरतें मत बो फ़क़ीरे फिर आईने के सच को झूठ …

रेत पर फूल खिलाने आए – जयनित मेहता

रेत पर फूल खिलाने आए दश्त में कितने दीवाने आए मिल गया राह में बचपन का यार याद फिर गुज़रे ज़माने आए धूप के पंख निकल आए जब कुछ शजर जाल बिछाने आए एक दिन बेखुदी जो ले डूबी तब मेरे होश ठिकाने आए वक़्त बेवक्त भड़ककर, आँसू ग़म की सरकार गिराने आए नाम लिक्खा …