जो तिरंगे में लिपटकर अपने घर लौट आए हैं उन सभी वीरों की रूहें जाविदानी हो गईं

निस्बतें इस दौर में यारो कहानी हो गईं और बातें भी उसूलों की पुरानी हो गईं मुफ़लिसी, बदकारियाँ, महँगाई, हिंसा, नफ़रतें ग़ालिबन अब ये बलाएँ आसमानी हो गईं दायरा मेरा बहुत छोटा है ये दुनिया बड़ी मेरी सारी दास्तानें लनतरानी हो गईं जो तिरंगे में लिपटकर अपने घर लौट आए हैं उन सभी वीरों की …

samra

आप ही कोई सूरत बता दीजिए- शिज्जु शकूर

संग राहों से मेरी हटा दीजिए संग राहों से मेरी हटा दीजिए ये ग़ज़ल मैंने यानि शिज्जु शकूर ने सर्वप्रधम छत्तीसगढ़ उर्दू तंज़ीम के लिए कही थी फिर इसे ओपनबुक्स ऑनलाईन डॉट कॉम के मंच पर इस्लाह के लिए रखा था। यह मैंने बहर 212 212 212 212 यानि बहर ए मुतदारिक मुसम्मन सालिम पर …