तुम्हारी याद में इक रात रुखसत और हो जाती

तुम्हारी याद में इक रात रुखसत और हो जाती तो फिर दुनिया के कहने को हिक़ायत और हो जाती मेरी जाँ को ऐ मालिक तूने बख़्शी नेमतें क्या-क्या बस उनके दिल में भी पैदा बसीरत और हो जाती नहीं रहता निशाँ तक मेरे घर का ऐसा लगता है अगर मुँह खोलने की इक हिमाक़त और …

जो दिल की तमन्ना है, लेखक संजय अग्निहोत्री

समीक्षा: जो दिल की तमन्ना है, लेखक- संजय अग्निहोत्री जो दिल की तमन्ना है, लेखक श्री संजय अग्निहोत्री द्वारा लिखी गई थ्रिलर उपन्यास है। इस उपन्यास को अंजुमन प्रकाशन, इलाहाबाद ने प्रकाशित किया है। इसका केंद्रीय पात्र मदन अपनी चालाकी और सूझबूझ का परिचय देते हुए, इंटेलीजेंस ऑफिसर विवेक की मदद द्वारा अपने दोस्त को बड़ी मुसीबत से …

रेत को आब-ए-रवाँ और धूप को झरना लिखा

रेत को आब-ए-रवाँ और धूप को झरना लिखा बेखुदी में मेरे दिल ने जाने ये क्या-क्या लिखा मेरे चेहरे पर न जाने क्या दिखा था उसको जो उसने दिल को मेरे इक टूटा हुआ शीशा लिखा तू तो सीधी राह पे था टूटके तूफाँ की तरह नासमझ लोगो ने तेरा हर क़दम उल्टा लिखा अब …

किसी ने सल्तनत से जब बगावत की

किसी ने सल्तनत से जब बगावत की हवाएँ चल उठीं पुरज़ोर नफ़रत की समर पेड़ों पे आते आते आएँगे तभी तुम देखना तासीर कुदरत की मुझे चलना पड़ेगा दुनिया से बचकर कि अब मिलने लगी है दाद हिम्मत की यहाँ तो कुछ ज़हीनों की ज़बाँ पर भी जमी है कितनी ही पर्तें कुदूरत की मनाए …

देखा है यूँ भी तज़्रबा करके

लफ़्जों से दर्द की दवा करके देखा है यूँ भी तज़्रबा करके तुम पे दहशत कोई मुसल्लत थी करना क्या था तुम आए क्या करके खींचता हूँ हयात को मैं फ़क़त कट रही है खुदा खुदा करके अपने माज़ी से है सवाल मेरा क्या मिला उनसे राबिता करके होश आ जाए नामुरादों को देखिए मुहतरम …

जो तिरंगे में लिपटकर अपने घर लौट आए हैं उन सभी वीरों की रूहें जाविदानी हो गईं

निस्बतें इस दौर में यारो कहानी हो गईं और बातें भी उसूलों की पुरानी हो गईं मुफ़लिसी, बदकारियाँ, महँगाई, हिंसा, नफ़रतें ग़ालिबन अब ये बलाएँ आसमानी हो गईं दायरा मेरा बहुत छोटा है ये दुनिया बड़ी मेरी सारी दास्तानें लनतरानी हो गईं जो तिरंगे में लिपटकर अपने घर लौट आए हैं उन सभी वीरों की …

samra

आप ही कोई सूरत बता दीजिए- शिज्जु शकूर

संग राहों से मेरी हटा दीजिए संग राहों से मेरी हटा दीजिए ये ग़ज़ल मैंने यानि शिज्जु शकूर ने सर्वप्रधम छत्तीसगढ़ उर्दू तंज़ीम के लिए कही थी फिर इसे ओपनबुक्स ऑनलाईन डॉट कॉम के मंच पर इस्लाह के लिए रखा था। यह मैंने बहर 212 212 212 212 यानि बहर ए मुतदारिक मुसम्मन सालिम पर …