संजय अग्निहोत्री

जो दिल की तमन्ना है, लेखक संजय अग्निहोत्री

समीक्षा: जो दिल की तमन्ना है, लेखक- संजय अग्निहोत्री

जो दिल की तमन्ना है, लेखक श्री संजय अग्निहोत्री द्वारा लिखी गई थ्रिलर उपन्यास है। इस उपन्यास को अंजुमन प्रकाशन, इलाहाबाद ने प्रकाशित किया है।

इसका केंद्रीय पात्र मदन अपनी चालाकी और सूझबूझ का परिचय देते हुए, इंटेलीजेंस ऑफिसर विवेक की मदद द्वारा अपने दोस्त को बड़ी मुसीबत से बचा लेता है।

इस उपन्यास की कहानी तेजी से आगे बढ़ती है। कहीं कोई घटनाक्रम बोझिल नहीं लगता। इसका कारण है कोई घटना ठूँसी हुई नहीं है। इस कहानी का घटनाक्रम पाठकों को सोचने पर मजबूर करता है। साथ ही उत्साह भी बनाए रखता है।

साथ ही इसमें अच्छी बात ये है कि हर घटना पूर्वनियोजित भली प्रकार से क्रमबद्ध की हुई है। कहानी में प्रयुक्त शब्द एवं भाषा चयन संजीदा है। इस उपन्यास में पाठकों की अभिरूचि का भी खयाल रखा गया है।

कुछ-कुछ बातें शुरू में उलझी हुई लगती है, जैसे प्रभा और राजपाल के बीच क्या चल रहा है? मदन प्रभा का कौन सा राज जानता है? नीता कौन थी और उसे मदन में दिलचस्पी क्यों थी? लेकिन कहानी आगे बढ़ते-बढ़ते बाद में बात साफ होती है कि हक़ीकत क्या है।

Book review | ghazal-go.com | Sanjay Agnihotri
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इस उपन्यास की कुछ बातें मुझे लगता है कहानी को कमज़ोर कर गईं। एक, केस के हल होते ही कहानी खत्म हो जाती है, उसके बाद बात को खींचना कुछ अनावश्यक लगा।

दूसरा, एक अनैतिक संबंध को खत्म करने के लिए दूसरे अनैतिक संबंध को जन्म देना और उसे स्वीकारना पुरूषों की सहज वृत्ति से परे की कल्पना है, यह इस किताब का कमज़ोर पहलू है।

तीसरा, मदन की कमज़ोरी का वर्णन अतिश्योक्तिपूर्ण है, यह बात भी गले के नीचे नहीं उतरती।

यह लेखक श्री संजय अग्निहोत्री की पहली किताब है, उम्मीद आगे आपकी और बेहतर किताबें पढ़ने को मिलेंगी।

शिज्जु शकूर

1 Comment

  1. Sanjay Agnihotri says:

    मेरे उपन्यास के तमाम पाठकों, मित्रों का कहना है कि आपने शिज्जु शकूर जी कि समीक्षा को मान दिया ये ठीक है, परन्तु उन्होंने अपनी समीक्षा मे जो मुद्दे उठाये हैं उनपर लेखक के विचार जरूर सामने आने चाहिए क्योंकि उसके बगैर बात अधूरी सी या स्वीकारोक्ति सी लगती है अतः अपने उन सभी पाठकों मित्रों की भावनाओं का मान रखते हुए मैं शिज्जु शकूर जी की समीक्षा पर निम्न टिप्पणी उसी क्रम मे कर रहा हूँ जिस क्रम मे उन्होंने मुद्दे उठाए हैं :
    श्री शिज्जु शकूर जी ने पहला मुद्दा उठाया है कि उनके मतानुसार केस के हल होते ही कहानी खत्म हो जाती है, उसके बाद बात को खींचना उन्हें अनावश्यक लगा ।
    इस बारे मे मेरा कहना है कि मैंने ये कोई जासूसी (उदाहरण के लिए कर्नल रंजीत, श्री वेद प्रकाश शर्मा आदि ) टाइप का उपन्यास नहीं लिखा जो कि एक केस से शुरू हुआ हो और केस के खत्म होते ही समाप्त हो जाय । यदि उपन्यास के प्रथम कुछ पृष्ठों पर ध्यान दें तो स्पष्ट हो जाएगा कि ये एक परिवार के जीवन के करीब 18 वर्षों की कथा है जो कथा के एक पात्र मदन की स्मृतियों के फ्लैशबैक मे है । इसी दौरान तमाम जिज्ञासायें भी उभरती हैं उनका समाधान मदन के फ्लैशबैक से बाहर आने पर ही सम्भव था । इसीलिए केस का समापन, उस खुशी मे डा प्रशान्त का मदन को प्रस्ताव व फ्लैशबैक का समापन ये सारा लगभग साथ साथ हुआ है । मैंने इस बात का विशेष ध्यान रखा है कि कथा का तारतम्य टूटने न पाये ।
    दूसरा मुद्दा, श्री शिज्जु शकूर जी का कहना है कि एक अनैतिक संबंध को खत्म करने के लिए दूसरे अनैतिक संबंध को जन्म देना और उसे स्वीकारना पुरूषों की सहज वृत्ति से परे की कल्पना है । श्री शिज्जु शकूर जी ने इसे इस उपन्यास का कमज़ोर पहलू बताया है ।
    इसके जवाब मे मेरा सिर्फ इतना कहना है कृपया उन पन्नों को ध्यान से दोबारा पढ़ें । श्री शिज्जु शकूर जी के इसी मुद्दे को मैंने प्रभा के मुख से तथा जवाब मदन के मुख से विस्तृत रूप से कहलवाया भी है । वैसे यदि कथा की परिस्थिति का पुनराकालन करेंगे तो समझ जाएँगे कि एक अनैतिक संबंध को खत्म करने के लिए दूसरे अनैतिक संबंध को जन्म नहीं दिया गया बल्कि डा प्रशान्त के केरियर, नाम, पारिवारिक परिस्थिति तथा शर्मिंदगी के सार्वजनिक हो जाने से बचने के लिए कथा के पात्र (मदन) को जो तात्कालिक रूप से उचित लगा वो आचरण उसने किया । वस्तुतः पुरुष पाठकों की ये स्वाभाविक तिलमिलाहट ही लेखक की विजय है क्योंकि मदन का आचरण परोक्ष रूप से लेखक द्वारा पुरुष समाज से पूछा गया प्रश्न है ।
    तीसरा मुद्दा, श्री शिज्जु शकूर जी को मदन की कमज़ोरी का वर्णन अतिश्योक्तिपूर्ण लगा । इसका जवाब सिर्फ इतना है कि मेडिकल साइंस इसे अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं मानता और मैं कोई पहला लेखक नहीं हूँ जिसने गाहे बगाहे किसी मानव मे पाई गई किसी ऐसी असाधारणता का उल्लेख किया हो जो कि सामान्यतया नहीं पायी जाती ।
    अंत मे अत्यंत विनम्रतापूर्वक निवेदन करना चाहता हूँ कि उपन्यास भले ही ये मेरा पहला है परन्तु लिख मैं उस उम्र से रहा हूँ जिस उम्र मे लोगों को नाक पोंछना भी ठीक से नहीं आता ।

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