- अमित वागर्थ

बुझे चराग़ को फ़िर-फिर जला रहा हूँ मैं – अमित वागर्थ

बुझे चराग़ को फ़िर-फिर जला रहा हूँ मैं

इलाहाबाद के शाइर अमित वागर्थ इलाहाबाद विश्वविद्यालय में सीनियर रिसर्च फेलो रहे हैं। अभी हाल ही में आपका चयन हरियाणा लोक सेवा आयोग से असिस्टेंट प्रोफ़ेसर (हिंदी) के पद पर हुआ है। अमित वागर्थ जी एक प्रतिभाशाली शाइर हैं। उनकी यह ग़ज़ल बहर 1212 1122 1212 22 पर आधारित है। इस बहर के आखिरी रुक्न में 22 जगह 112 भी लिया जा सकता है।

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बुझे चराग़ को फ़िर-फिर जला रहा हूँ मैं
नज़र में दुनिया के फिर भी हवा रहा हूँ मैं

तमाम रात मुझे नींद कैसे आएगी
तमाम रात यही सोचता रहा हूँ मैं

वो ख़त जो अपने पते पर कभी नहीं पहुंचे
उन्हीं बेनाम ख़तों का पता रहा हूँ मैं

ख़फा-ख़फा सी रही है ये जिंदगी मुझसे
ख़फा-ख़फा ही सही चाहता रहा हूँ मैं

मैं उससे जब भी मिला हूँ, मिला सलीके से
ये और बात की अक़्सर ख़फा रहा हूँ मैं

वो एक शख़्स जो सबकी दुआ में है शामिल
उसी ही शख़्स को बस चाहता रहा हूँ मैं

अमित वागर्थ

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