खून ए दिल से लफ़्ज़ मुअत्तर करता है – के पी अनमोल

खून ए दिल से लफ़्ज़ मुअत्तर करता है क्या-क्या जादू एक सुखनवर करता है रात-रात भर खुद ही खुद में जग-जगकर दुनिया भर की सोच मुनव्वर करता है मेरा बेड़ा मँझधारों में उलझा के एक छलावा रोज़ समंदर करता है पेशानी पर बोसा तेरी चाहत का दिल पर कितने जंतर-मंतर करता है गैरों को मुस्कान …

क़लम से छोड़ दिए कुछ निशान काग़ज़ पर – के पी अनमोल

क़लम से छोड़ दिए कुछ निशान काग़ज़ पर करेगा याद हमें अब जहान काग़ज़ पर मिला है जितना तज़ुर्बा हयात से हमको लिखा है उसको सुखन की ज़ुबान काग़ज़ पर बहुत हुआ कि हक़ीक़त की छत पे आ जाओ भरी है तुमने अभी तक उड़ान काग़ज़ पर यहाँ ग़रीब के हिस्से में झोंपड़ी भी नहीं …

गाँव को भी शहरी जीवन दे गया – के पी ‘अनमोल’

आप सभी के हुज़ूर पेश है रूड़की के सशक्त ग़ज़लकार मोहतरम के. पी. अनमोल साहब की एक बेहतरीन ग़ज़ल, गाँव को भी शहरी जीवन दे गया कौन इतना अजनबीपन दे गया एक गज टुकड़ा ज़मीं का देखिए भाई को भाई से अनबन दे गया याद मैंने क्या दिलाया उसको फ़र्ज़ हाथ में मुझको वो दरपन …