किस-किस बात का रोना रोया जाए – खुर्शीद खैराड़ी

किस-किस बात का रोना रोया जाए दरिया में हर ग़म को डुबोया जाए छाँट लिए जाएँ काँटे आँचल के फूलों का इक हार पिरोया जाए अपने जैसा तो न ज़माना होगा यार ज़माने जैसा होया जाए हमने जो अहसान किए लोगों पर इस गठरी को कब तक ढोया जाए सूख गई है रिश्तों की हरियाली …

तेरा क्या था गया जो खो फ़क़ीरे – ख़ुर्शीद ख़ैराड़ी

तेरा क्या था गया जो खो फ़क़ीरे तसल्ली ओढ़कर तू सो फ़क़ीरे भला कैसे क़बूलें भोर का सच है जस का तस अँधेरा तो फ़क़ीरे हैं झूठे जाति-मज़हब के ये झगड़े निभाना आदमीयत को फ़क़ीरे हर इक शय खाक़ में इक दिन मिलेगी तू इतनी हसरतें मत बो फ़क़ीरे फिर आईने के सच को झूठ …

बात से बात निकालो तो कोई बात बने – ख़ुर्शीद खैराड़ी

जोधपुर के रहने वाले श्री खुर्शीद खैराड़ी जितनी कमाल की ग़ज़ले कहते हैं उतने ही सशक्त छंदकार भी हैं। इनका पूरा नाम महावीर सिंह हैं, आप भारतीय रेलवे में पर्यपेक्षक के पद पर कार्यरत हैं। इनकी रचनाएँ विभिन्न प्रिंट व वेब पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। –शिज्जु शकूर बात से बात निकालो तो कोई …