सीने से चिमटा कर रोये – निलेश नूर

सीने से चिमटा कर रोये आदरणीय निलेश “नूर” जी की इस ग़ज़ल के शिल्प पर उस्ताद और वरिष्ठ ग़ज़लकारों नें विस्तार से अपनी बात कही है। उनके अपने तर्क हैं निलेश नूर साहिब के अपने। यदि ग़ज़ल में आप कोई प्रयोग करते हैं तो आपके पास तर्क भी होने चाहिए। मैं निजी तौर पर श्री …

दिल के ज़ख्मों से उठी जब से गुलाबी ख़ुशबू – निलेश नूर

दिल के ज़ख्मों से उठी जब से गुलाबी ख़ुशबू “दिल के ज़ख्मों से उठी जब से गुलाबी ख़ुशबू” निलेश नूर भाई की यह ग़ज़ल सबसे पहले मैंने ओबीओ पर पढ़ी थी।  बेहद मुश्किल रदीफ को  उन्होंने बड़ी आसानी से निभाया है। बहर 2122 1122 1122 22 पर  लिखी इस ग़ज़ल का हर शे’र मानीख़ेज़ है। ग़ज़ल …

बस किसी अवतार के आने का रस्ता देखना – निलेश ‘नूर’

इंदौर के श्री निलेश शेवगाँवकर ‘नूर’ जी के ग़ज़ल कहने का अंदाज़ ही सबसे जुदा है, उनका लहजा समकालीन ग़ज़लकारों के बीच उन्हें अलग पहचान देता है। निलेश नूर साहब की ये ग़ज़ल एक आईना है; आज की परिस्थितियों का अक्स इसमें दिखाई देता है –शिज्जु शकूर बस किसी अवतार के आने का रस्ता देखना …