ghazal Farmood Allahabadi

नहीं निगाह में मंज़िल, तो जुस्तजू ही सही – फ़रमूद इलाहाबादी

नहीं निगाह में मंज़िल, तो जुस्तजू ही सही पेश है फरमूद इलाहाबादी जी की एक मिजाहिया ग़ज़ल नहीं निगाह में मंज़िल, तो जुस्तजू ही सही किसी हसीन से “चैटिंग” पे गुफ्तगू ही सही मेरी पसंद तो दरअस्ल है तेरी आपा उसे पसंद नहीं मैं, तो यार तू ही सही अगर मिली न मुझे कोई “इंडियन” …