कितने अच्छे थे मेरा ऐब बताने वाले

कितने अच्छे थे मेरा ऐब बताने वाले वो मेरे दोस्त मुझे राह दिखाने वाले वक्त ने, काश! उन्हें रुकने दिया होता ज़रा साथ ही छोड़ गए साथ निभाने वाले मुफ़लिसी मक्र की छाई है सियाही अब भी पर बताओ हैं कहाँ शम्अ जलाने वाले अपने क़ातिल से शिकायत नहीं कोई मुझको कर गए ग़र्क मेरी कश्ती, …

पत्ता था, सब्ज़, टूटके खिड़की में आ गया

पत्ता था, सब्ज़, टूटके खिड़की में आ गया हस्ती शजर की बाकी है मुझको बता गया माना हवाएँ तेज़ हैं मेरे खिलाफ़ भी लेकिन जुनून लड़ने का इस दिल पे छा गया खोने को पास कुछ भी नहीं था हयात में किसकी तलाफ़ी हो अभी तक मेरा क्या गया शायद ये दुनिया मेरे लिए थी …

दिल ए नाकाम पर हँसी आई

दिल ए नाकाम पर हँसी आई तेरे इलज़ाम पर हँसी आई जिस मुहब्बत की आरज़ू थी बहुत उसकेे अंजाम पर हँसी आई दास्ताँ अपनी लिखने बैठा था अपने इस काम पर हँसी आई जिसमें तुमने कभी रखा था मुझे आज उस दाम पर हँसी आई मेरे क़ातिल का तज़किरा जो हुआ तो हर इक नाम …

मैं जैसे-तैसे किसी बद-नज़र से निकला था

मैं जैसे-तैसे किसी बद-नज़र से निकला था कोई बला थी मैं जिसके असर से निकला था तू संग ओ खार की बातें तो कर रहा है बता कि पाँव बरहना कब अपने घर से निकला था सुना है मैंने कि कल उसपे संगबारी हुई मगर वो पहले भी तो उस नगर से निकला था बुझा-बुझा सा …

दरिया मेरे क़रीब जो आकर सिमट गया

दरिया मेरे क़रीब जो आकर सिमट गया तनहा मै अपने आपसे खुद ही लिपट गया पन्ने कई मरोड़ के फेंके ज़मीन पर नाक़ामियों से जैसे ये कमरा ही पट गया जब भी मिले हरीफ़ मुझे अपने ही मिले दिल से मुहब्बतों का यूँ अहसास घट गया आरी बहुत ही तेज़ थी लालच की इसलिए आया …

ख़मोशी तेरी फितरत है

ख़मोशी तेरी फितरत है? नहीं तो या दिल में कोई दहशत है? नहीं तो तुम्हारे क़त्ल की बातें हुई थीं किसी दुश्मन की हरकत है? नहीं तो फ़क़त बातों के दम पर राज करना ये अपनी-अपनी किस्मत है? नहीं तो बराबर सबको शीशे में उतारा तो क्या ये भी तिजारत है? नहीं तो हवा के …

तुम्हारी याद में इक रात रुखसत और हो जाती

तुम्हारी याद में इक रात रुखसत और हो जाती तो फिर दुनिया के कहने को हिक़ायत और हो जाती मेरी जाँ को ऐ मालिक तूने बख़्शी नेमतें क्या-क्या बस उनके दिल में भी पैदा बसीरत और हो जाती नहीं रहता निशाँ तक मेरे घर का ऐसा लगता है अगर मुँह खोलने की इक हिमाक़त और …

रेत को आब-ए-रवाँ और धूप को झरना लिखा

रेत को आब-ए-रवाँ और धूप को झरना लिखा बेखुदी में मेरे दिल ने जाने ये क्या-क्या लिखा मेरे चेहरे पर न जाने क्या दिखा था उसको जो उसने दिल को मेरे इक टूटा हुआ शीशा लिखा तू तो सीधी राह पे था टूटके तूफाँ की तरह नासमझ लोगो ने तेरा हर क़दम उल्टा लिखा अब …

किसी ने सल्तनत से जब बगावत की

किसी ने सल्तनत से जब बगावत की हवाएँ चल उठीं पुरज़ोर नफ़रत की समर पेड़ों पे आते आते आएँगे तभी तुम देखना तासीर कुदरत की मुझे चलना पड़ेगा दुनिया से बचकर कि अब मिलने लगी है दाद हिम्मत की यहाँ तो कुछ ज़हीनों की ज़बाँ पर भी जमी है कितनी ही पर्तें कुदूरत की मनाए …

देखा है यूँ भी तज़्रबा करके

लफ़्जों से दर्द की दवा करके देखा है यूँ भी तज़्रबा करके तुम पे दहशत कोई मुसल्लत थी करना क्या था तुम आए क्या करके खींचता हूँ हयात को मैं फ़क़त कट रही है खुदा खुदा करके अपने माज़ी से है सवाल मेरा क्या मिला उनसे राबिता करके होश आ जाए नामुरादों को देखिए मुहतरम …