एक मुट्ठी आसमाँ बाक़ी रहा – समीर परिमल

एक मुट्ठी आसमाँ बाक़ी रहा, ग़ज़ल, समीर परिमल बहर 2122 2122 212 पर कही गई एक मुट्ठी आसमाँ बाक़ी रहा, ग़ज़ल, समीर परिमल साहिब की बेहतरीन गज़लों में से है। बेहतरीन रवानी, लाजवाब कहन और सधे हुए शिल्प का बेमिसाल उदाहरण है समीर परिमल साहिब की यह गज़ल। एक मुट्ठी आसमाँ बाक़ी रहा हौसलों का कारवाँ …

जहाँ के रिवाजों की ऐसी की तैसी – समीर परिमल

पटना(बिहार) के श्री समीर परिमल जी वरिष्ठ ग़ज़लकार हैं, जो समाज में व्याप्त विसंगतियाँ चाहे वो सियासी हो या सामाजिक, की पुरज़ोर मुख़़ालिफत करते हैं। उनकी ग़ज़लें सत्य को ज़ोरदार तरीके से सामने रखती हैं। –शिज्जु शकूर जहाँ के रिवाजों की ऐसी की तैसी ज़मीं के ख़ुदाओं की ऐसी की तैसी पतीली है खाली वो …