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आज के ग़ज़ल गो

चाँद का पहरा भी था – अमित वागर्थ

इलाहाबाद के शाइर अमित वागर्थ  की गज़ल-

बज़्म थी तारों की उसमें चाँद का पहरा भी था
धूम थी रानाइयों की दिल मेरा तन्हा भी था

इक नदी थी नाव भी थी और था मौसम हसीं
साथ तुम थे बाग़ गुल थे इश्क़ मस्ताना भी था

यार की गलियाँ गया मैं फिर से लेकर आरज़ू
कुछ पुराने ख्वाब थे हर सम्त वीराना भी था

कैसे-कैसे लोग मिलते हैं यहाँ देखो सही
बात में चीनी घुली थी दिल मगर काला भी था

वो अजब ही दौर था हर बात पर हँसते थे हम
ये जहाँ गोया लतीफ़ा मस्त बचकाना भी था

अमित वागर्थ

1 comment on “चाँद का पहरा भी था – अमित वागर्थ

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