Ghazal, Siyasat, Ravi Shukla
रवि शुक्ल

हमें न ख़्वाब दिखाओ चुनाव के दिन हैं – रवि शुक्ल

हमें न ख़्वाब दिखाओ चुनाव के दिन हैं

रवि शुक्ल जी बेहद संजीदा ग़ज़लकार हैं। उनकी संजीदगी देखिए इस तंज़िया गज़ल में भी खूब नज़र आई है। चुनाव और राजनीति में कई ग़ज़लें कही गई हैं लेकिन रवि साहिब का लहज़ा बिल्कुल जुदा है। इस शे’र को देखिए जो चल रहे हैं ज़माने में ले के नफ़रत को, सभी अलम वो जलाओ चुनाव के दिन है, जी हाँ ये सच है हमें नफ़रत के ध्वजवाहकों को रास्ते पर लाना है तो खुद ही नफ़रत के ध्वजों को जलाना होगा। रवि शुक्ल जी की भारतीय राजनीतिक हालात पर तंज़िया ग़ज़ल पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया ज़रूर दें। यह ग़ज़ल बहर 1212 1122 1212 22 पर आधारित है। इस बहर के आखिरी रुक्न में 22 की जगह 112 भी लिया जा सकता है। पाँचवे शे’र में अरूज़ में निर्दिष्ट छूट के अनुसार एक अतिरिक्त लघु(1) लिया गया है।

Ghazal, Siyasat, Ravi Shukla

हमें न ख़्वाब दिखाओ चुनाव के दिन हैं
अभी तो होश में आओ चुनाव के दिन है

बला से कोई बने शाह मुल्क में माना
तुम अपना फ़र्ज़ निभाओ चुनाव के दिन हैं

ख़ता मुआफ़ उसूलों को आज रहने दो
अदू से हाथ मिलाओ चुनाव के दिन हैं

गुज़िश्ता पाँच बरस का हिसाब पूछेंगे
कहाँ थे आप बताओ चुनाव के दिन हैं

सहीह आज ये मौका बदल दो सूरते हाल
कदम कदम ही बढ़ाओ चुनाव के दिन हैं

चराग बुझने लगे जुल्म की हवाओं से
नई मशाल जलाओ चुनाव के दिन है

जो चल रहे हैं ज़माने में ले के नफ़रत को
सभी अलम वो जलाओ चुनाव के दिन है

अदू – दुश्मन, गुज़िश्ता – गुज़रा हुआ, सहीह – उचित, अलम – ध्वज

रवि शुक्ल, बीकानेर(राजस्थान)

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