निलेश 'नूर'

दिल के ज़ख्मों से उठी जब से गुलाबी ख़ुशबू – निलेश नूर

दिल के ज़ख्मों से उठी जब से गुलाबी ख़ुशबू

“दिल के ज़ख्मों से उठी जब से गुलाबी ख़ुशबू” निलेश नूर भाई की यह ग़ज़ल सबसे पहले मैंने ओबीओ पर पढ़ी थी।  बेहद मुश्किल रदीफ को  उन्होंने बड़ी आसानी से निभाया है। बहर 2122 1122 1122 22 पर  लिखी इस ग़ज़ल का हर शे’र मानीख़ेज़ है। ग़ज़ल सीखने वालों की जानकारी के लिए एक बात ज़रूर बताना चाहूँगा कि इस बहर के आखिरी रुक्न में 22 की जगह 112 भी लिया जा सकता है और पहले रूक्न में 2122 की जगह 1122 भी लिया जा सकता।

Nilesh Noor | ghazal-go

दिल के ज़ख्मों से उठी जब से गुलाबी ख़ुशबू,
शहर में फैल गई मेरी वफ़ा की ख़ुशबू.

ये महक, बात नहीं सिर्फ हिना के बस की,
गोरी के हाथों महकती है पिया की ख़ुशबू.

फूल को ख़ुद में समेटे हुए थी कोई क़िताब,
फूल से आने लगी आज क़िताबी ख़ुशबू.

वो कडी धूप में निकले तो हुआ यूँ महसूस,
जैसे निकली हो पसीने में नहाती ख़ुशबू.

चंद लम्हात गुज़ारे थे तुम्हारे नज़दीक़,
बस उसी रोज़ से पहनी है तुम्हारी ख़ुशबू.

दिल के जंगल में खिला याद का महुआ जो कभी,
‘नूर’ को याद बहुत आई कुँवारी ख़ुशबू

-निलेश ‘नूर’

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3 Comments

  1. हरिवल्लभ says:

    बहतरीन ग़ज़ल वाह्ह

  2. राज़िक़ अंसारी says:

    बहुत ही उम्दा ग़ज़ल है मोहतरम

  3. रमेंश बनासिया says:

    सुंदर अति सुंदर

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