- समीर परिमल

एक मुट्ठी आसमाँ बाक़ी रहा – समीर परिमल

एक मुट्ठी आसमाँ बाक़ी रहा, ग़ज़ल, समीर परिमल

बहर 2122 2122 212 पर कही गई एक मुट्ठी आसमाँ बाक़ी रहा, ग़ज़ल, समीर परिमल साहिब की बेहतरीन गज़लों में से है। बेहतरीन रवानी, लाजवाब कहन और सधे हुए शिल्प का बेमिसाल उदाहरण है समीर परिमल साहिब की यह गज़ल।

एक मुट्ठी आसमाँ बाक़ी रहा, ग़ज़ल, समीर परिमल

एक मुट्ठी आसमाँ बाक़ी रहा
हौसलों का कारवाँ बाक़ी रहा

ले गईं मुझको बहाकर ख़्वाहिशें
रेत पर लेकिन निशाँ बाक़ी रहा

वो चिराग़े-दिल बुझा कर चल दिए
और फिर उठता धुआँ बाक़ी रहा

ख़ौफ़ के साये में सूरज छुप गया
जुगनुओं का इम्तेहाँ बाक़ी रहा

रात भर उड़ता था मेरे साथ जो
वो परिंदा अब कहाँ बाक़ी रहा

आँधियों ने कोशिशें तो लाख कीं
दिल में पर हिन्दोस्ताँ बाक़ी रहा

पूछता ‘परिमल’ है मुझसे हर घडी
क्या हमारे दरमियाँ बाक़ी रहा

3 thoughts on “एक मुट्ठी आसमाँ बाक़ी रहा – समीर परिमल

  1. और ग़ज़ल का खूबसूरत अहसास बाक़ी रहा…
    बहुत उम्दा ग़ज़ल… हार्दिक बधाई

  2. बहुत खूब मोहतरम लाजवाब ग़ज़ल कही है आपने

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