लम्हा जो दिल में तेरी याद जगा देता है – एहतराम इस्लाम

पेश है एहतराम इस्लाम साहिब की किताब ‘हाज़िर है एह्तराम’ से एक ग़ज़ल

लम्हा जो दिल में तेरी याद जगा देता है

Ghazal go, Ehtaram Islam

लम्हा जो दिल में तेरी याद जगा देता है
दश्त ए वीराँ को भी गुलज़ार बना देता है

सफ़्ह’-ए-ज़ेह्न पे यादों के क़लम से कोई
नाम लिखता है कोई और मिटा देता है

तश्न’-लब जिसपे तरस खा के समंदर कोई
रेग़ज़ारों को गई राह दिखा देता है

होके रक्सां मेरी आँखों में तेरा अक्स-ए-जमाल
रंग आईनों के चेहरों का उड़ा देता है

लम्हे-लम्हे से अंदेशा जुनूँ-ख़ेज़ी का
लम्हा-लम्हा तेरी यादों का पता देता है

इन्तिज़ार उसके तबस्सुम का न क्यों हो सबको
मुस्कुराता है कि माहौल सजा देता है

‘एह्तराम’ उसकी बिही-ख़्वाही का मातम कीजे
दौर-ए-जाँ-सोज़ में जीने की दुआ देता है

इन्तिज़ार उसके तबस्सुम का न क्यों हो सबको
मुस्कुराता है कि माहौल सजा देता है

एहतराम इस्लाम

दश्त ए वीराँ – वीरान जंगल, सफ़्ह’-ए-ज़ेह्न – मन का पन्ना, तश्न’-लब – प्यासा, रेग़ज़ार – रेगिस्तान, अक्स-ए-जमाल – सौंदर्य का प्रतिबिंब,
दौर-ए-जाँ-सोज़ – जान जलाने वाले दौर में

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