Urdu Ghazal, Manju Kachhawa, Ghazalgo, Bikaner
डॉ मंजु कछावा 'अना'

जो दश्ते-ज़ीस्त से हँस कर गुज़र नहीं सकता – डॉ. मंजु कछावा ‘अना’

जो दश्ते-ज़ीस्त से हँस कर गुज़र नहीं सकता

आज हम आपको रू-ब-रू करवाते हैं मरू नगरी बीकानेर की तेजी से लोकप्रिय होती हुई शायरा मोहतरमा डॉ मंजू कच्छावा ‘अना’ साहिबा की ग़ज़ल से। डॉ. मंजू कच्छावा बीकानेर के साहित्यकाश में एक उभरता हुआ नाम है जिन्होंने थोड़े समय में ही अपनी उम्दा लेखनी से एक आला मुकाम हासिल कर लिया है। आपकी ग़ज़लों में जहां इंसानी रिश्तो पर सतर्क नज़र रहती है। वही मानव मन के अंर्तद्वंद्व पर भी आप बखूबी शेर कहती हैं। मजरूह दिल के एहसास को अल्फाज देने हो या कुदरत के मनाज़िर से रू-ब-रू करवाना हो; आप को महारत हासिल है। यह आइंदा ग़ज़लों में आपको देखने को मिलेगा। जिंदगी की सच्चाई हो चाहे इश्क की वह अपने एहसास को इस तरह बयां करती हैं- समां है कितना हँसी रू-ब-रू तू है मेरे, मगर यह वक़्त यहीं पर ठहर नहीं सकता।
-रवि शुक्ल

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जो दश्ते-ज़ीस्त से हँस कर गुज़र नहीं सकता
वो मंज़िलों का तो इम्कान कर नहीं सकता

मैं जानती हूँ तेरे ज़ब्त और हिम्मत को
तू टूट सकता है लेकिन बिखर नहीं सकता

भँवर से डर है जिसे और प्यार साहिल से
समुंदरों में बशर वो उतर नहीं सकता

समां है कितना हसीं रू -ब -रू तू है मेरे
मगर ये वक़्त यहीं पर ठहर नहीं सकता

मैं राहगीर सदाक़त की राह का हूँ जब
कोई डराए मेरा दिल तो डर नहीं सकता

जो रास्ते के ही ज़ेरो-ज़बर से घबराये
कभी भी उसका मुक़द्दर सँवर नहीं सकता

जो नेकियों से बनाये दिलों में सबके जगह
है जाविदाँ ही दिलों में वो मर नहीं सकता

अगर दुआ ही न निकले ज़ुबाँ से उसकी ‘अना’
फ़क़ीर का कभी कश्कोल भर नहीं सकता

डॉ. मंजु कछावा ‘अना’

शब्दार्थ
दश्ते-ज़ीस्त – ज़िन्दगी रूपी जंगल, इम्कान – संभावना, ज़ब्त – सहन करना, बशर – इन्सान, सदाक़त – सच्चाई,
ज़ेरो-ज़बर – ऊँचे-नीचे, जाविदाँ – अमर, कश्कोल – भिक्षा-पात्र

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2 Comments

  1. लाल चन्द जैदिया "जैदि" says:

    बहुत लाजवाब गजल है मेम।

  2. बहुत अच्छी ग़ज़लें कहती हैं आप । अना साहिबा मुबारकबाद पेश करता हूँ । स्लमात रहें

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