Hindi Ghazal, Latest Poetry
- गिरिराज भंडारी

धारणाएँ हों मुखर, तो चुप रहें – गिरिराज भंडारी

धारणाएँ हों मुखर, तो चुप रहें

गिरिराज भंडारी उस शख़्सियत का नाम है जिन्होंने रिटायरमेंट की उम्र में ग़ज़ल सीखना शुरू किया। उनके अंदर सीखने की तीव्र ललक थी। और शिल्प के प्रति सचेत इतने कि यदि किसी ने इस्लाह बताई तो निस्संकोच स्वीकार कर लेते हैं। लेकिन ग़ज़ल के शिल्प और शब्दों के प्रयोग को लेकर मुख्तलिफ ग़ज़लकारों के मुख़्तलिफ़ सोच के खिलाफ वे कठोर नज़र आते हैं। अक्सर शाइरों का नज़रिया और टिप्पणी किसी भी ग़ज़ल में शाइर के शख्सियत के मुताबिक होती है। यह बात श्री गिरिराज भंडारी जी को नापसंद है। यह विद्रूपता उनकी इस ग़ज़ल में भी है। यह ग़ज़ल बहर 2122 2122 212 पर आधारित है। आपकी दो किताबें तेरे नाम का लिए आसरा और पुकारा है हमने उसे बार-बार अंजुमन प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की गई है।

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धारणाएँ हों मुखर, तो चुप रहें
सच न पाए जब डगर, तो चुप रहें

शब्द ज़िद्दी और अड़ियल जब लगें
और ढूँढें, अर्थ अगर तो चुप रहें

जब धरा भी दूर हो आकाश भी
आप लटके हों अधर, तो चुप रहें

कृष्ण हो जाये किशन, स्वीकार हो
शह्र पर जब हो समर तो चुप रहें

सीखने वालों पे यारों पिल पड़ें
जब ग़लत हो नामवर, तो चुप रहें

तेल और पानी मिलाने के लिए
कोशिशें देखें अगर, तो चुप रहें

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