Ghazal Go

आज के ग़ज़ल गो

फोकट की ये बातें हमको मत गिनवाओ – गिरिराज भंडारी

हमको मत गिनवाओ

पेश है ग़ज़ल गो में गिरिराज भंडारी जी की एक ग़ज़ल –

फोकट की ये बातें हमको मत गिनवाओ
नकली उख़ड़ी सांसें, हमको मत गिनवाओ

खंज़र वाले हाथ कभी काँपे क्या उनके ?
आज हुई प्रतिघातें, हमको मत गिनवाओ

वर्षों से सूरज का ख़्वाब दिखाते आये
अब तो काली रातें हमको मत गिनवाओ

शहर शहर को तोड़ तोड़ के गाँव करो तुम
बची खुची चौपालें हमको मत गिनवाओ

फुलवारी के बीच बनी थी हर पगडंडी
कोलतार की सड़कें हमको मत गिनवाओ

क्षितिज छू रहीं बाहों का विस्तार कहाँ है
सिमटी लूली बाहें , हमको मत गिनवाओ

कहीं शरारे दौड़ न जायें फिर नस नस में
इतिहासों की घातें ,हमको मत गिनवाओ

प्यासे को तो रोज़ चाहिये पानी यारो
मरुथल में सौगातें, हमको मत गिनवाओ

सरहद पार के झूठे रिश्ते आम हो गये
अब तो उनकी चाहें हमको मत गिनवाओ

गिरिराज भंडारी

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