समर कबीर

मुंह देखते हैं मेरा हुनर देखते नहीं – समर कबीर

मुंह देखते हैं मेरा हुनर देखते नहीं

समर कबीर साहिब का तज़्रबा, ग़ज़ल के साथ-साथ उर्दू में उनकी पकड़ बतौर शाइर उन्हें विशिष्ट पहचान देते हैं। इसी ग़ज़ल में देखिए उन्होंने क्या कमाल के अशआर कहे हैं। अंजान बनके पूछ रहे हो कि क्या हुआ, अखबार में छपी है खबर देखते नहीं  अपना बनने वाले जब अपनेपन का दिखावा करते हैं तो कुछ ऐसी परिस्थितियाँ बनती हैं। यह हर आम आदमी से तअल्लुक रखता शे’र है। ग़ज़ल के अभ्यासियों की जानकारी के लिए, समर साहिब की यह ग़ज़ल बहर 221 2121 1221 212 में कही गई है।

मुंह देखते हैं मेरा हुनर देखते नहीं

मुंह देखते हैं मेरा हुनर देखते नहीं
हर दिल पे हो रहा है असर देखते नहीं

दीवाने अपने हाल से रहते हैं बेख़बर
किस सम्त हो रहा है सफ़र देखते नहीं

उर्यानियत के खेल इन्हें भी पसंद हैं
ख़ामोश हैं ये एहल-ए-नज़र देखते नहीं

वो देश हित की फ़िक्र में ग़लताँ हैं आज कल
ये और बात है कि इधर देखते नहीं

अंजान बन के पूछ रहे हो कि क्या हुवा
अख़बार में छपी है ख़बर देखते नहीं

कुछ देर और सब्र का दामन न छोड़ना
वो सामने खड़ी है सहर देखते नहीं

हर लम्हा जिन को इज़्ज़त-ओ-ग़ैरत का पास है
पगड़ी को देखते हैं वो सर देखते नहीं

शब्दार्थ
सम्त – तरफ़, उर्यानियत – नग्नता, एहल ए नज़र – नज़र वाले
ग़लताँ – लुढकता हुआ, पास – लिहाज

“समर कबीर”

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *