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बैद्यनाथ 'सारथी'

इन्तिज़ार इन्तिज़ार है तो है – सारथी

इन्तिज़ार इन्तिज़ार है तो है

पटना के बैद्यनाथ सारथी ग़ज़लकारों की इस पीढ़ी के सशक्त और प्रतिभाशाली रचनाकार हैं। उन्हें अपनी रचनाओं को सहेजना और सँभालना आता है। किसी भी ग़ज़ल में बहर का आकार या अशआर की तादाद तासीर तय नहीं करती। बल्कि कहन की मजबूती भी ग़ज़ल का मेआर तय करती है। सारथी जी की छोटी बहर में कही गई ग़ज़ल अपना असर छोड़ने में कामयाब रही है।
उदाहरण के तौर पर सारथी जी का यह शे’र देखिए मुँह से यक ब यक वाह निकल जाता है।
-शिज्जु शकूर

“दीद का लुत्फ़ हो गया हासिल
अब नज़र कर्ज़दार है तो है”

इन्तिज़ार इन्तिज़ार है तो है
ऐतबार ऐतबार है तो है

छोड़ कर मुझको सिर्फ़ इक वो चाँद
हिज़्र का राज़दार है तो है

बावला दिल मेरी तो सुनता नहीं
आपका इख़्तियार है तो है

मैं हूँ नादाँ अगर तो, हूँ तो हूँ
वो अगर होशियार है तो है

दीद का लुत्फ़ हो गया हासिल
अब नज़र कर्ज़दार है तो है

1 Comment

  1. Pulkit Shekhar says:

    उम्दा

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