मुन्तज़िर फ़िरोज़ाबादी

जौन एलिया: एक अजब गजब शाइर – मुन्तज़िर फ़िरोज़ाबादी

जौन एलिया: एक अजब गजब शाइर

जौन एक मुँहफट, बेबाक और बागी शायर थे। आप जौन को जितना पढ़ेंगे उतना जौन खुलते आएँगे। कुछ दिन में आप इस जौन वाइरस से एडिक्टड हो जाएँगे और एक तिश्नग़ी आपका शिकार करने लगेगी। नए शायरों की ग़ज़लें भी अब मीर, मोमिन, ग़ालिब, फ़ैज़, ख़ुमार के आगोश से सिमटती हुई जौन एलिया की बारगाह में आ गई हैं। जौन के शेर कहने का अंदाज़ ऐसा है कि उसमें ड्रामा भी है, झुंझलाहट भी है। बने बनाए नियमों को तोड़ देने की जिद भी है और दर्शन भी है।

किताब की ख़ासियत

हिंदुस्तान के अमरोहा में पैदा हुए और पाकिस्तान के कराची की मिट्टी में दफ़्न हुए जौन एलिया वह शायर हैं जो हयात रहते हुए ही उर्दू अदब की दुनिया में अच्छी-ख़ासी मक़बूलियत हासिल कर गए थे। आज जौन हमारे बीच नहीं हैं। लेकिन उनकी नज़्मों और ग़ज़लों के अलावा उनके ज़ाती ज़िंदगी के क़िस्से भी बड़े लगाव के साथ सुने और सुनाए जाते हैं। इस किताब में ग़ज़लें, नज़्में, क़त’आत का संकलन है। इसमें सबसे ख़ूबसूरत पहलू ‘जौनियत’ मतलब जौन की शख़्सियत के कुछ अनछुए पहलुओं को छूने की कोशिश की गई है। यक़ीनन इस किताब को पढ़कर आप एक नई दुनिया में दाख़िल होंगे।
– मुन्तज़िर फिरोज़ाबादी

जौन एलिया साहिब के कुछ अश’आर :

जो गुज़ारी न जा सकी हम से
हम ने वो ज़िंदगी गुज़ारी है

ये मुझे चैन क्यूँ नहीं पड़ता
एक ही शख़्स था जहान में क्या

बहुत नज़दीक आती जा रही हो
बिछड़ने का इरादा कर लिया क्या

कौन इस घर की देख-भाल करे
रोज़ इक चीज़ टूट जाती है

क्या कहा इश्क़ जावेदानी है!
आख़िरी बार मिल रही हो क्या

ए वहशतो, मुझे उसी वादी में ले चलो
ये कौन लोग है ये कहाँ आ गया हूँ मैं

खुद पे नादिम हूँ जौन, यानी मैं
इन दिनों हूँ कमाल पर अपने

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