ghazal Farmood Allahabadi
फ़रमूद इलाहाबादी

नहीं निगाह में मंज़िल, तो जुस्तजू ही सही – फ़रमूद इलाहाबादी

नहीं निगाह में मंज़िल, तो जुस्तजू ही सही

पेश है फरमूद इलाहाबादी जी की एक मिजाहिया ग़ज़ल

ghazal Farmood Allahabadi

नहीं निगाह में मंज़िल, तो जुस्तजू ही सही
किसी हसीन से “चैटिंग” पे गुफ्तगू ही सही

मेरी पसंद तो दरअस्ल है तेरी आपा
उसे पसंद नहीं मैं, तो यार तू ही सही

अगर मिली न मुझे कोई “इंडियन” लड़की
तो “चाइना” में करूं ब्याह, “वांग चू” ही सही

मुझे बना लो शरीके हयात कोई तरह
शरीयतन न हो मुमकिन तो पालतू ही सही

तुम्हारे वास्ते हाज़िर है थोबड़ा मेरा
करो न प्यार मुझे तुम तो “आक थू” ही सही

मची है देस इस वक़्त लूट हर जानिब
अगरचे “बैंक” न लूटो तो आबरू ही सही

बचाओ लाज, अरे बेटियो चलो सीखो
बजाए “डाँस-ड्रामा” के “कुंग-फू़” ही सही

करेंगे “हूट” भी “फ़रमूद” लोग बाग तुझे
कोई जवाब न सूझे तो “थैंक्यू” ही सही

बचाओ लाज, अरे बेटियो चलो सीखो
बजाए “डाँस-ड्रामा” के “कुंग-फू़” ही सही
फ़रमूद इलाहाबादी

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